About Me

I write poems - I m going towards me, I write stories - किस्से ओमी भैय्या के, I write randomly - squander with me

Saturday, July 21, 2012

कसम

सागर को नापने से 
रोकने की कोशिश की हैं 
पानी में दौड़ने वालो को
बांधने की कोशिश की हैं 
साजिश ये बादलो और 
लहरों ने मिल के की हैं
लेकिन हमने भी तैरते 
रहने की कसम ली हैं 

कश्ती को हिलाने लहरे
और ऊँची आ भी जाए 
काले बादलो से बिजली 
की ललकार आ भी जाये 
हिम्मत को हराने कोई 
बड़ा तूफ़ान आ भी जाये 
लेकिन हमने भी लड़ते 
रहने की कसम ली हैं
 
Photocourtesy Grishma Shah

Thursday, July 19, 2012

चाँद के साथ

तेरी जुल्फे तेरी मुस्कराहट तेरे बहाने
तेरी अदाएं तेरे नखरे तेरे फ़साने
आज करते रहे तेरी बात चाँद के साथ
 
कोई पुरानी ग़ज़ल याद में तेरी
कोई अपनी ही लिखी आधी अधूरी
आज लिखते रहे नज़्म चाँद के साथ
 
तेरी खिड़की से नज़र आते होंगे
सारी रात पहचानते रहे ऐसे तारे  
आज जागते रहे हम चाँद के साथ
 
रातरानी की खुशबू में जैसे खोये
चांदनी रौशनी में डुबोये हुए
आज भींगते रहे हम चाँद के साथ
 
उड़ते बादलो में देखी निशानी  तेरी
खोजते रहे कहीं लब कहीं आँखे तेरी  
आज बनाते रहे तस्वीर चाँद के साथ

Saturday, July 14, 2012

शब्दों का जाल

ख़ुशी या गम सब तेरे ही
मैं कोई अहसास न जानु  
जानी अनजानी मंजिले तेरी ही  
मैं तो आवांरा रास्तो पर भटकू  
कहता फिरता इधर उधर की
मैं खुद  अपने बारे में न जानु 
अर्थ जो निकल पाए वो तेरे ही 
मैं तो बस शब्दों का जाल बिछाऊ  
 
होली में शब्दों के रंग उड़ा दू 
राखी में शब्दों के धागे बांधु  
दीपक दिवाली में शब्दों के जलाऊ 
मिठाई की जगह मीठी बात बताऊ 
त्योहारों के मज़े सारे तेरे ही
मैं तो बस तुझको याद दिलाऊ 
जितनी यादें जहन में आये वो तेरी ही
मैं तो बस शब्दों का जाल बिछाऊ
 
बनते बिगड़ते रिश्ते तेरे ही
मैं तो बस रिश्तो की बात बताऊ 
रूठने मनाने के बहाने तेरे ही
मैं तो बस पुराने पन्ने पलटाऊ  
मेरा एक ही रिश्ता शब्दों संग यारी  
बस मैं अपना रिश्ता इनसे निभाऊ
शब्द जो रिश्ते बचा पाए वो तेरे ही
मैं तो बस शब्दों का जाल बिछाऊ 

Monday, July 09, 2012

तुने देखा होता

ना थी हमारी किस्मत, तो ये किस्मत ही सही
जाना ही था एक दिन, तो तेरा जाना ही सही
थी यहाँ तक बस तो, छोटी ये कहानी ही सही
पुरे ना हो सके कुछ, झूटे कुछ टूटे वादे ही सही
लेकिन कम से कम, एक अहसान तो किया होता   
जाते वक़्त एक बार, मुड़ के तो तुने देखा होता
हम तेरी मज़बूरी का, कोई अंजान बहाना बना लेते  
की होगी तुने पूरी कोशिश, सोच के जिन्दगी बिता देते 

वियोग रस

कवि तुम बड़े हो निष्ठुर प्राणी
विरहन ही तुमको नज़र है आती
वियोग का रस ही पीते हो
और बताते उसको दुखियारी
 
क्या मैं स्त्री ये न जानु
कैसे विरह का खेल रचा
एक पुरुष ने दुःख दिया तो
दूजे ने उसपे गीत लिखा
 
जब किसी पुरुष से जीवन  
का दर्द ना सहा गया
मैखाने में शाम रात हुई
तब उसपे कुछ न लिखा गया
 
मंदिर मस्जिद से बेहतर बोला
पावन कर दी मधुशाला 
दहलीज के जो भीतर बैठी रही
उसके दिल का राज़ ही खोला
 
खोजो शब्दों में सार्थकता
फिर तुमने क्यों ये भेद रचा
जिसकी याद में रोते हो
क्यूँ कहते उसको बेवफा

Thursday, May 17, 2012

हंगामा

बिगड़े हालत पर ना होना हताश
खुद की बातों पे ही खुश रहना 
जब तक तुमको फर्क न पड़े 
क्यों कुछ बदलने की हिम्मत करना 
क्यूंकि हिम्मत करने से होता है हंगामा
और तुमको हंगामे की आदत नहीं 

सोचते रहना और कहते रहना
बात बात पे बहस भी करना
खुद को पढा लिखा साबित करना
बस जितना पढ़ाया उतना ही जानना 
क्यूंकि ज्यादा जानने से होता हैं हंगामा
और तुमको हंगामे की आदत नहीं 

कोई और मरे, कोई और लड़े
जिसको कूदना है वो आग में कूदे
तुम तो बस आराम से रहना 
बस अपने रास्तो पर ही चलना 
क्यूंकि रास्ते बदलने से होता है हंगामा
और तुमको हंगामे की आदत नहीं 

सत्ता, कुर्सी, पैसा या फिर रुतबा
कोई लूटे अकेला, कही है पूरा कुनबा 
लेकिन फिर भी तुम चुप ही रहना 
अपने दरवाजों को बंद ही रखना 
क्यूंकि सच कहने से होता है हंगामा
और तुमको हंगामे की आदत नहीं

Friday, May 04, 2012

साली की सगाई

साली ने पुछा दीदी से 
मेरी सगाई और जीजा नहीं आये 
कहते थे आधी घरवाली 
क्या मेरे वियोग के दुःख से नहीं आये 
कहना उनसे मैं थी रूठी 
अब मुझको मनाने फ़िर से ना आये 
मेरे प्रियतम भी दामाद बने  
अब पहले सा ना अपना रुबाब दिखाए 

आते वो भी साथ
मगर हालत कुछ ऐसे बन गए 
आना पड़ा मुझे अकेला
वो अपनी साली की सगाई में नहीं आये 
दीदी बोली अपनी व्यथा 
मुझको भी बड़े शहर में अकेले छोड़ गए 
क्या कहू मैं तुमसे बहना
तुम्हारे जीजा तो है विदेश गए 

Tuesday, April 10, 2012

राखी के धागे


कभी गुड़ियों का घर भी न संभल पाता था 
अब घर की बातो में सुबह से शाम हो जाये 
बची हुई आखिरी मिठाई के लिए जो लड़ता था 
अब उसने मीठा खाया कि नहीं ये ख्याल सताए 

कभी पिताजी के बगल की कुर्सी पर जताते थे हिस्सा 
तो कभी किसे ज्यादा प्यार करती हैं माँ इसका झगड़ा 
कभी संग बैठने पर भी जिनको आता था गुस्सा
अब मिलने के लिए किसी त्यौहार की आस लगाये 

लड़ते लड़ते ना जाने कब वो भाई बहन बड़े हो गये 
उनके गुड़िया, गाड़िया और बंदूके पुराने हो गए 
छोड़ बचपन का घर वो दोनों दूर चले गए 
लेकिन फिर भी राखी के धागे बंधे रह गए  

Sunday, April 08, 2012

संसद


जिनको चुनके भेजा था अब खुद ना चुन सके वो नेता 
लोकतंत्र में कोई भी पार्टी बेटा ही होगा सबका नेता 
वोटो की गिनती के बाद अपने वादों को भुला चुका 
घोषणाओं का वो पिटारा जीत के जश्न में जला चुका  
अब शुरू होना है उनके संघर्ष का एक नया किस्सा 
आशाएं है बहुत उनकी अब होगा उनका भी हिस्सा 
आम जनता को भूले दुर दराज़ के निकले रिश्ते नाते  
इनके उनके नामो से नित नए बैंको में खुल रहे खाते 
संसद से नदारद फ़िर भी मुद्दा बनाने न्यूज़ सेंटर आता 
समितियों से बना दिया है जैसे हर संसोधन का नाता
करने को बहस आते लेकिन अंत में फाड़ देते हैं परचा
हूटिंग करते मगर वोटिंग से पहले मांगे अपना खर्चा 
सबके अपने तरीके कुछ को वाक् आउट पसंद आता 
बाहर जाने का शौक है इतना फ़िर वो अंदर क्यूँ आता 
अब ना रहे वो लड़ने वाले अब नहीं रहीं वो लोकसभा
बिकते वोटो के बीच कहीं थोड़ी बिकती है राज्यसभा

Saturday, April 07, 2012

अरमान मेरे


आखों में शरारत
और होठों से बहाने बनाया ना करो 
जुल्फों को बांधो
हवां के साथ यूँ उड़ने दिया ना करो 
ओ हुस्न की मलिका
इस तरह सामने आया ना करो
अरमान मासूम है मेरे 
इनको बेईमान बनाया ना करो  

चलते हुए यूँ अचानक 
गहनों की दुकान पर रुका ना करो
उठा के तरह तरह की 
बालियाँ कानो से लगाया ना करो 
हर बार अपने रूप की 
छटा यूँ राहों पर बिखराया ना करो 
अरमान मासूम है मेरे 
इनको बेईमान बनाया ना करो  

आइना बन जाता है वो 
रात में तुम चाँद को निहारा ना करो   
तारे भी दीवाने तुम्हारे 
तुम ऊँगली दिखा के उन्हें इशारे ना करो 
मंद रौशनी में तुम 
रातरानी की तरह महका ना करो 
अरमान मासूम है मेरे 
इनको बेईमान बनाया ना करो  

Wednesday, March 21, 2012

कवितायेँ मेरी पढ़ती हो


शब्द मेरे कागज़ के फूल 
खुशबू तुम ले आती हो 
छंद मेरे ठहरा हुआ पानी 
लहरे तुम ले आती हो 
कवितायेँ मेरी अधुरी सी 
सार्थक तुम बना देती हो  
लिखने की वजह मिल जाती है  
जब भी कवितायेँ मेरी पढ़ती हो

किसी संजीदा बात पे 
आखें नम कर लेती हो 
भावुक होकर अब ना पढूंगी 
जब भी ऐसा कहती हो 
लिख लेता हूँ कुछ ऐसा 
लगता है जो हँसने जैसा  
व्यंग्य पढ़ कर मेरे
जो मुस्कुरा देती हो 
लिखने की वजह मिल जाती है 
जब भी कवितायेँ मेरी पढ़ती हो

लिखता रहूँगा मैं तो ऐसे ही 
कुछ तुम भी पसंद कर लेना
जो बात समझ में ना आये 
बकवास समझ कर भुला देना
बस याद रखना इतना ही
मेरा लिखा तो बस जीवन की बाते
बातो में जीवन तुम लाती हो 
लिखने की वजह मिल जाती है  
जब भी कवितायेँ मेरी पढ़ती हो

Friday, January 27, 2012

रात का दर्द


रात के अँधेरे को  
निराशाओं का मायने न बना दिया होता 
हमेशा तुमने बस 
इसके बीत जाने का इंतज़ार न किया होता 
रौशनी के लिए 
बस आने वाले दिन का आसरा ना लिया होता 
जो तुम कुछ और सुन पाते 
तो समझ जाते एक अकेली रात का दर्द 

दूर कहीं बैठे 
सितारों से लिपटी फिर भी दूर ही रहती 
चाँद भी इसका 
कभी आधा कभी पूरा तो कभी अमावस्या 
रतजगो में फंसे 
रात के मुसाफिरों ने भी इसको कोसा 
जो तुम कही ठहर जाते 
तो समझ जाते एक अकेली रात का दर्द 

भूख

भजन सुनाते आते जाते
करते हैं बड़ी बड़ी बाते 
कहते मैं हूँ भविष्य देश का 
और मैं ही हूँ वरदान शिव का 
कभी धरा का इन्सान महान
तो कभी सितारों सा दीप्तमान 
जितने लोग उतनी ही बाते 
सारी यूँ ही बेकार की बाते
कोई नहीं बताता कैसे कमाऊ रोटी
आखिर भूख भी तो कोई चीज़ है होती 

Thursday, January 26, 2012

बूढी माँ

इस बार जब वो शहर से
छुट्टियों में वापस गाँव आया
रसोई में बर्तनों को बिखरा पाया
डब्बो के ढक्कन खुले पड़े थे
माँ की साफ़ रहने वाली रसोई में
तेल के कुछ दाग बिखरे पड़े थे
आधे काले आधे सफ़ेद बालो से ढके
चेहरे पे कुछ झुर्रिया भी थी
काम करते करते थक कर
माँ अक्सर बैठ भी जाती थी
लेकिन सुनकर उसकी फरमाईश
आँखों में चमक पहले सी थी
निकल पड़ी अपना वही पुराना
झोला लेकर सामान खरीदने
इतने दिनों बाद आया है बेटा
उसके लिए गाज़र का हलवा बनाने
लेकिन जब गाजर के हलवे में 
नमक पड़ गया
और स्वाद से वो
नमकीन हो गया 
तब भी रखा उसने याद
हलवे में स्नेह की मिठास
समझ गया वो
अब वक़्त आ गया है
कि अब वो भी बड़ा हो जाये 
माँ की ऊँगली छोड़
अब उसका हाथ थाम ले 
माँ की नज़र अब कमज़ोर हो रही है 
क्यूंकि माँ अब बूढी हो रही है

जिनके खयालो से


एक ख्याल की जगह हो गयी खाली 
जो बात हुई आज पुराने दोस्तों से 
अब पता चला उठ गयी उनकी डोली
अरमान थे रोशन मेरे जिनके खयालो से

हमने सुना दुल्हन के लिबाज़ में 
उस दिन खूब लग रही थी वो 
मेहमानों के भीड़ में जाने 
पहचाने चेहरे खोज रही थी वो 
जब देखा मेरे दोस्त को 
पलकों से ये बात बतायी उसने 
नदी जो तैर आयी आखों में 
उसमे दो बुँदे भी है मेरे लिए   
अब जाना वो भी रोये थे याद करके हमे 
अरमान थे रोशन मेरे जिनके खयालो से

इतने भी दिन तो नहीं हुए 
अपना शहर हमे छोड़े हुए 
जैसे कल ही उसके घर पर 
गए थे कोई बहाना करके
मजाक में उसने कही थी शादी की बात
हमे लगा था हमे रोकने के है तरीके 
काश कुछ और पल उनसे चुराए होते  
अरमान थे रोशन मेरे जिनके खयालो से


(हमारे एक मित्र को समर्पित  )

Saturday, November 19, 2011

इश्क होने लगा है


अरमानो के सुने मकान में 
हर पल निगाहों के सामने 
दिल की तेज धडकनों में 
अब कोई रहने लगा है 
शायद ये खुमार है या फ़िर 
इश्क होने लगा है 

इत्तेफाक से कोई मिल जाये 
हर बार ऐसा होता तो नहीं 
ऐसे ही इत्तेफाक पे यकीन
ना जाने क्यूँ होने लगा है 
ये यकीन भी इत्तेफाक है या फ़िर
इश्क होने लगा है 

Tuesday, November 15, 2011

रंगरेज़ पिया

ओ रंगरेज़ पिया मुझे रंग दे 
तु अपने ही इश्क के रंग में

मंदिर मस्जिद मैं क्या जाऊ
बिकते वहाँ है कपड़े रंग बिरंगे 
बाज़ार बना कर रखा है सबने 
तेरा रंग आखिर कौन बताये
ओ रंगरेज़ पिया मुझे रंग दे 
तु अपने ही इश्क के रंग में

चमड़ी रंग दी गोरी काली
रख दिया कोरा मन मेरा 
इसको कितने रंग चढ़ाये 
फिर भी रहा ना कोई गहरा  
ओ रंगरेज़ पिया मुझे रंग दे 
तु अपने ही इश्क के रंग में

Sunday, July 31, 2011

तुम

एक अधुरी कविता हो तुम
मेरी कालजयी रचना हो तुम
एक अनसुलझा विचार हो तुम
कुछ लिख लेने की वजह हो तुम
होठो में छाई ख़ामोशी हो तुम
आँखों में तैरती ख्वाहिश हो तुम
कुछ पा लेने का हौसला हो तुम
कुछ खो देने का सुकुन हो तुम

जितना करीब आता हूँ
उतनी ही दुर हो तुम
जितना तुम्हे जानता हूँ
उतनी ही नयी सी हो तुम
कोई रिश्ता सा लगता है
फ़िर भी अंजान हो तुम
सोचता हूँ अक्सर यही कि
ज़िन्दगी ऐसी क्यों हो तुम?

Monday, July 11, 2011

मेरी कविताये यु न पढ़ा करो

तुम शब्द मेरे यु न सुना करो
हृदय की वेदना यु न जाना करो
कुछ सूखे कुछ गिले कागज है
तुम इनको यु न छुआ करो
कितनी बार कहा है तुमसे
मेरी कविताये यु न पढ़ा करो

रातकली तुम स्वप्न में मिली
स्वप्न की बाते न किया करो
भोर की किरणों से न बच पाया
उस सपने के बारे में न पूछा करो
कितनी बार कहा है तुमसे
मेरी कविताये यु न पढ़ा करो

न कोई छंद न कोई अलंकार
सजावट की यु न आशा करो
जो याद आये वो लिख पाए
सभी बातो की यु न बाते करो
कितनी बार कहा है तुमसे
मेरी कविताये यु न पढ़ा करो

Wednesday, June 29, 2011

ट्रेफिक जाम

गाड़ियों के पीछे है गाड़ियों का रेला
गाड़ियों के आगे खड़ा सिपाही अकेला
लाल बत्ती को सब कोसे है भैया
कार की सीट पे सिमट गयी दुनिया

होर्न पर शक्ति प्रदर्शन है करते
भूल गए सब्र से इंतेज़ार करना
थोड़ी सी जगह से चाहे निकलना
सब चाहे यही तो कैसे होगा जाना

कहने को पढ़े लिखे है डॉक्टर
कोई है इंजिनियर कोई है मैनेजर
समस्या में देखो इनका योगदान
अपनी तो कार हम है बड़े इन्सान

कुछ का काम अमीरों को कोसना
अपनी स्कूटर या ऑटो खुसेड़ना
छोटे से अहंकार के सब है मारे
नियमो को पालना सिद्धांतो के परे

अपने दो मिनट की जल्दी में
दुसरो के लुटवाए दिए घंटे
गलती मान के सुधर जाये
ऐसे तो नहीं कोई नेक बंदे

कह गए सिया से देखो राम
कलजुग माने ट्रेफिक जाम
कैसे सतयुग फिर से आएगा
बेचारा किसी सिग्नल पे फँस जायेगा

तेरा ख्याल

जब भी आया तेरा ख्याल
जैसे किसी ने लगा दिया गुलाल
और रंग बिखर गए चेहरे पर
जैसे होली का हो त्यौहार

फिर याद आये दोस्तों से झगड़े
तेरे लिए कॉलेज से भी भागे
न जाने कितना लेते रहे उधार
बस करके वादा कल दे देंगे यार

छोड़ा आये अपना शहर
तोड़ के रिश्ता वो पुराना
मेरे ऑफिस में नहीं कोई
टूटी फूटी टपरी का कोना
अक्सर याद आते है हाय
वो एक समोसा और एक चाय

Saturday, June 25, 2011

लोकतंत्र का नारा

ये कैसा है लोकतंत्र का नारा
आम आदमी है नेताओ का मारा

कोई थोपा जाता हाई कमान से
कोई बन जाता प्रधानमंत्री जन्म से
जिसको कहना है वो चुप बैठ रहता
जिसको समझ नही वो काव काव है करता
किसी को अपनी बेटी की चिंता
देश की बेटिया चाहे मरती रहे
कोई लगवाता अपनी मूर्ति यहाँ वहाँ
चाहे देश की मूर्ति खंडित होते रहे
केंद्र का करते है ये विरोध
सकारात्मक विपक्ष की भूमिका
राज्यों में सरकार इनकी
लेकिन फिर भी वही पिटारा
ये कैसा है लोकतंत्र का नारा
आम आदमी है नेताओ का मारा

पत्रकार एजेंट बने है और
उद्योगपति काटे जंगल
जंगल वाले चलाये गोली
हर परिवार का बेटा घायल
अपना देश अपना न रहा
गर्व था जिन शहरो पर
उन शहरो में गाव का आदमी
अब बाहरी बन है गया
वोटो ने बिगाड़ा है खेल सारा
ये कैसा है लोकतंत्र का नारा
आम आदमी है नेताओ का मारा

Tuesday, April 26, 2011

मेरे पाँव

गीली ठण्ड को महसुस करते है
पानी को छुना पाँव भूले नहीं
उंगलियों में रेत छुपा के लाते है
लहरों से चोरी करना भूले नहीं
सम्हलने की कोशिश करते है
चट्टानों पे खड़ा होना भूले नहीं
कंकडो से साफ़ जगह देख लेते है
पत्थरो की पहचान भूले नहीं
भागने की होड़ में चल नहीं पाते
कदमो के निशान छोड़ना भूले नहीं
भूले नहीं थे कुछ भी मेरे पाँव
बस इन जूतों में बंधे रहते थे

Photo courtesy of Hari

Saturday, March 12, 2011

सड़के

मेरे गाँव की दो सड़के
कहने को तो दोनों हमारी
लेकिन एक कच्ची एक पक्की
पहले दोनों कच्ची थी
दुःख दर्द की साथी थी
एक के गड्ढो पर दूसरी भी रोती थी
दोनों अभागी सी जीती थी
कच्ची से हुआ ये व्यव्हार सौतेला
क्युकि पक्की से दौरा मंत्री का था निकला

एक दिन किसी को गाँव के याद आयी
उसने मंत्री से आने की गुहार लगायी
था उसने सोचा गाँव के हालत दिखा कर
उनको सवाल पूछेगा विकास के नाम पर
मंत्री के आने से पहले
चमचो ने सड़क बनवाई
पैसे लिए दोनों के लेकिन
किस्मत एक ही की चमकाई
कर दिया कुछ इंतज़ाम ऐसा
गाँव लगने लगा शहर जैसा
जिस रास्ते आया था
उसी रास्ते लौटा काफीला
मंत्री को भा गया विकास ऐसा
जिसने शिकायत की थी उसे फटकारा
बोले इस गाँव को मॉडल बनायेंगे
और इसी तरह देश को प्रगति की राह पर चलाएंगे

अब पक्की को हो गया
गुमान नए रूप पर अपने
किसी अमीर महिला के तरह
वो देती कच्ची को ताने
भाग कर्म के देनी लगी प्रवचन
तो कभी कच्ची के चरित्र पर लांछन
कच्ची से और ना सुना गया
उसने भी अपना आप खो दिया
इतना ना इतराओ पक्की से बोली
दुःख दर्द के साथी से ठीक नहीं ऐसी ठिठोली
ये जो रूप में निखार आया है
बस ऊपर से पावडर ही लगाया है
अंदर से तुम भी कमजोर मेरी जितनी
धो कर जायेगा तुम्हे बारिश का पहला पानी
फ़िर अपने रूप के साथ ना जी पायोगी
समझती हु तुम्हे फ़िर कभी ना हंस पाओगी

वो शाम

राह तो तुमने देर तक देखी होगी
मुझसे लड़ने की जरुर ठानी होगी
लेकिन मेरे ना आ पाने के फ़िर भी
कुछ बहाने कुछ वजहे सोची होगी
खत्म ना हुआ होगा तेरा इंतेज़ार
वो शाम जो अब तक है उधार

किसी फूल की खुशबू ने तुमको
फ़िर से यादो में ठकेला होगा
एक ही सवाल के जवाब ने तुमको
फ़िर से कई सवालो में घेरा होगा
उसने बनाया होगा फ़िर से लाचार
वो शाम जो अब तक है उधार

उन राहों पर जो फ़िर से चल पाता
सही गलत की जो जिरह कर पाता
लम्हों का हिसाब जो मैं रख पाता
अपना हर क़र्ज़ जो अदा कर पाता
तो दे जाता तुम्हे ये अनुपम उपहार
वो शाम जो अब तक है उधार

Tuesday, March 01, 2011

शादी की बात

एक दिन सुबह माता ने फ़ोन घुमाया
और लड़की देखने का फरमान सुनाया
हम तो अभी उठे है नहाने का प्लान बनाया है
और उसके बाद हमे अभी ऑफिस भी जाना है
जो उनको समझाया तो बोली वहा भी चले जाना
उससे मिलो पहले जिससे तुम्हे है मिलवाना
जमाना अब नया है मिलने का तरीका भी नया
घर में चाय नहीं किसी कॉफ़ी शॉप में ही बुला लिया
मेनू को देखकर वो उसमे जो थेसिस करने लगी
हमने उन्हें याद दिलाया ये पहली मुलाक़ात है अपनी
अभी तुम पचास रुपये ही क्वालीफाई कर पाई हो
जो महंगा है खाना तो खर्च करो जो अपने पैसे लाई हो
हर मुलाक़ात के बाद तुम्हारा बजेट बढ़ाएंगे
MBA किया है कभी तो दिमाग लगायेंगे

खाने का नाम सुनकर वो बोली
अभी बना लेती हु चाय और मैग्गी
कुछ दिन उसपर काम चलाना होगा
कभी मेरी तो कभी तुम्हारी माँ को गेस्ट बनाना होगा
होता काम बहुत है शुक्रवार तक
मूवी हम शनिवार को ही जायेंगे
तुम्हारे कार्ड में थोड़ी सी शापिंग
और वीकेंड खाना बाहर ही खायेंगे

गृहस्थ जीवन का ऐसा सुन्दर सपना
हम दोनो ने जो मिल जुल के देखा
एक कॉफ़ी में ही बात जम गयी
और पिज्जा खाने की रकम बच गयी
आमंत्रण के नाम पर
फेसबुक में एक इवेंट बना दिया
और शादी की जगह
फेसबुक का स्टेटस बदल दिया
अब हम जीवन जन्मान्तर के साथी है
पांच दिन ऑफिस के और दो दिन अपने खातिर है

रेत का फूल

यहाँ रेत का समुन्दर है
लहरों में हवा का शोर है
सूरज उगलता है आग
कोई ना रहा अब मेरे साथ

कभी थी कलियों यहाँ खेलती
फूलो से सजी थी ये नगरी
आती गयी सबकी बारी
अब यहाँ मैं अकेला पहरी
खुशबु का लगता था मेला
रंगों का था जादू फैला

था रंगों पे गुमान सबको
मौसम की लगी नज़र हमको
ऐसा मौत का मंजर देखने
रेत में अब हु मैं अकेला
सिख लिया रेत में जीना
पानी की हर बूँद को पीना
हर साथी को सूखते देखा
रंगों को दफ़न होते देखा

लड़ता रहा मौसमो के साथ
हर बूँद कुछ और देर बचाता रहा
जिस्म में बची है अब थोड़ी सी जान
खड़ा हु लेके बाकियों का अरमान
बारिश के आने की है आस
फैला के जाऊंगा बीज जो है मेरे पास

वो कचरा बीनता है

टूटी बोतलों के ढक्कन में
फटे कपड़ो के साबुत जेबों में
छोटे मोटे लोहे के टुकडो में
वो ज़िन्दगी तलाशता है
वो कचरा बीनता है

कुछ आकार बना लेता है
जंग लगे तारो से
बेकार चीजों के ठेर में भी
वो खिलौना तलाशता है
वो कचरा बीनता है

लोगो की गालियों को कर
अनसुना अपने में खोया रहता है
दिखने में कम उमर का शायद
वो अपनी उमर तलाशता है
वो कचरा बीनता है

फेके गए टूटे हुए सामानों में
कुछ साबुत टुकड़े खोज ही लेता है
लोगो के इस्तेमाल हुई खुशियों में
अपनी भी ख़ुशी तलाशता है
वो कचरा बीनता है

Monday, January 31, 2011

भीगी सी याद

आज सुबह घर के बाहर
कुछ ओस के बुँदे है
शायद रात में कोई
भीगी सी याद गुजरी होगी
दीवारों से सट कर
हथेलियों को जोड़ कर
इधर उधर पानी फेकती
भीगी सी याद गुजरी होगी

हम भी भीगा करते थे
कागज़ की नाव के साथ
छोटी छोटी लहरों के संग
सब दौड़ लगाये करते थे
रेशमी दुप्पटे के आड़ में कभी
कभी किसी के इंतज़ार में
मिटटी पर पैरो के निशान बनाते
पैदल चलते भीगा करते थे
उन्ही जाने अनजाने मोड़ो की
भीगी सी याद गुजरी होगी

गर्माहट है मुठ्ठियों की
हवा में थोड़ी ठंडक है
सच के सूखे मौसम में
गीली ये ओस की बुँदे है
किसी का तोहफा देने को
भीगी सी याद गुजरी होगी

Saturday, January 29, 2011

ख़ामोशी

खामोश है हवा
बंद खिडकियों के दरम्या
खामोश है दीवारे
उनमे टंगी तस्वीरो की तरह
अजीब सी ख़ामोशी
आजकल रहती है मेरे घर में
ख़ामोशी के शोर में
खुद से हो नहीं पाती बाते

इस कोने से
घर के उस कोने तक
जाने कितनी
मीलो की है दुरिया
जब गया था
पिछली बार मैं वहा
सुना था उस
कोने का भी फलसफा

अपनी शक्ल भी
आईने में अजनबी लगती है
अब जिंदगी भी
बिता हुआ कल लगती है
खोल लु दरवाज़ा
अब मेरी हिम्मत नहीं होती
अजीब सी ख़ामोशी
अब मेरे लबो से नहीं जाती


Wednesday, January 05, 2011

गुमनाम शाम

कभी किसी गुमनाम शाम की बाहों में
युहीं याद आ जाता है वो पुराना वादा
फ़िर बीते हुए लम्हों की तस्वीर लिए
वो ताकता रहता है खाली आसमा

आखों के रंग बदलती थी जो बाते
आज अपने साथ ले आती है बुँदे
युहीं पलकों में तैरती रहती है
अब उनको जमीन पे नहीं गिराता

किसी के आने की उम्मीद नहीं रखता
ना किसी इत्तेफाक पर यकीन करता
युहीं इस तरह वक़्त है बीत जाता
फ़िर भी वो उस जगह से नहीं उठता

Tuesday, January 04, 2011

कवि की व्यथा

एक मृगनयनी
कवि महाराज से बोली
ये आप क्या करते हो
इधर उधर की बाते कहते हो
कभी बाते गंभीर होती है
अक्सर बिना सर पैर की होती है
क्यों नहीं कुछ अच्छा लिखते
कुछ प्रेम व्रेम की बाते करते
जो कभी किया नहीं प्यार
तुमे लगे नहीं लिख पाओगे श्रृगांर
तो एक कम करो आसान
चलाओ कोई हास्य का बाण

कवि ने सोचा
लिखे कोई प्रेम कविता
करे युवती के रूप का बखान
फिर आया उसके दबंग भाइयो का ध्यान
वैसे भी नारी वर्णन में कितने कवि बर्बाद हुए
परेशान थे अब कैसे अपनी नैया पार लगे

बालिके को इम्प्रेस करने कि जो थी ठानी
उन्होंने हास्य की पुरी हिस्ट्री छान मारी
किसी असहाय का मजाक उड़ाना
होगा हास्य निम्न कोटि का
लेकिन औकात भी कहा थी
कि लिखे कुछ उच्च कोटि का
राजनीति से प्रेरित व्यंग्य के दिन लद गए
क्युंकि आम लोग उनसे ज्यादा कमीने हो गये
आजकल हँसी के माने बदल गए
टीवी के कुछ शो हँसाने को रह गए

लिख दी बाते दो चार
कुछ आचार कुछ विचार
खुद समझ नहीं पाये क्या लिखा है
हास्य के नाम पर क्या गंध छोड़ा है
विनाशकाले विपरीत बुद्धि से बच गए
और सही समय पर अपने इरादों से हट गए

किसी को बताया नहीं
कि कभी कुछ ऐसा भी था लिखा
मृगनयनी से बोले
लिखेंगे आपके लिए ये वादा रहा



Monday, November 29, 2010

कभी मिल गए तो

अगर कभी करनी पड़ जाये बात
तो सोचता हु पहले कौन बोलेगा
क्या होगी कोई नयी सी बात
या वही पुराना किस्सा होगा
 
पुरानी आदतों की शिकायत होगी
या अंजानो की तरह परिचय होगा
क्या पुछेंगे हम दुर रहने का सबब 
या फिर पास आने का इरादा होगा  
 
होगी लबो पे बेवजह मुस्कान 
या आखों में खालीपन होगा
तेरे चेहरे में कोई शिकन होगी
या सुर्ख गालो का रंग लाल होगा
 
शायद जिंदगी होगी तेरी बेहतर
और शिकवा बस हमे होगा
अगर कभी करनी पड़ जाये बात
तो सोचता हु पहले कौन बोलेगा

Monday, October 25, 2010

दीवाने

भीड़ भरे बाजारों से
जो गलिया गुजरती है
आवाजों के झुरमुट में 
पहचानी कोई हंसी नहीं 

हर एक लम्हे में 
एक उम्र गुजरती है
और इंतज़ार में उनके
शाम ढलती ही नहीं

कुछ देर में बादलो की भी 
बस तस्वीर बदलती है 
रंग बदलते आसमा में 
एक रंग है जो आता नहीं 

यु सूरज को डुबाने से
अँधेरा तो हो जाता नहीं
रौशनी चाँद की बहुत है  
चिलमन है कि हटते नहीं

एक दीदार की तमन्ना में
रात युही गुजरती है
फिर भी सकरी गलियों में 
इन दीवानों की कमी नहीं

Wednesday, October 13, 2010

माटी

हल सुनाऊ दिन भर का 
बैठे थे सब साथ में साथी 
खेल रचे थे भाति भाति 
साँझ भई तो माटी के पुतले 
मिल गए फिरसे माटी में

सब लगते थे जैसे सच्चे
प्रेम के थे जो संबंध बांधे 
निभाई दुश्मनी भी कुछ से 
साँझ भई तो घर को लौटे 
रह गए रिश्ते माटी में

कुछ जोड़ा और कुछ घटाया
घर भी बनाये सपनो के
अपने नाम से नारे लगाये
मिटा दिए नाम किसी के 
साँझ भई तो कोई ना रहे
खो गए नाम माटी में

Monday, October 11, 2010

अग्निपथ

शंखनाद का अनुनाद है
चुनौतीयो के संवाद है
ना शस्त्र है ना अस्त्र है
ये ऐसा एक कुरुक्षेत्र है
जहाँ हर प्रहार सख्त है
ये जीवन एक अग्निपथ है

झुलसी हुई पलके है
नयनो को छुती लपटे है
अश्रु की धारा अनवरत है
फिर भी बढते वो स्वपन है
आहुति में गिरता ये रक्त है
ये जीवन एक अग्निपथ है

भाग्य बस एक खेल हो
कर्मो का ऐसा मेल हो
सबसे महान वो मनुष्य है
जिसने पाया अपना उद्देश्य है
आगे बढते रहना ही गत है
ये जीवन एक अग्निपथ है

Saturday, October 09, 2010

गौरिया

टेबल पर बिखरी किताबो से
जब मन उब जाता था
मेरे खिड़की पर कोई
एक संगीत युही सुनाता था

फुदक कर नन्हे कदमो से
वो जैसे दुरिया नापती थी
या नृत्य की कोई नयी विधा
जो मुझको सिखाना चाहती थी

कभी सूखे तिनके
अपनी चोंच में ले आती थी
जैसे अपने बन रहे
घर की बाते मुझे बताती थी
एक गौरिया कभी मेरी खिड़की पर आती थी

अब खिड़की के सामने
एक ईमारत ऊँची है
खोजा उसे बहुत पर
वो बस यादो में बची है

एक मित्र ने बताया
उसके घर अब भी आती है
मुझसे जैसे रूठ गयी पर
कुछ लोगो से अभी भी दोस्ती है

मेरी बस यही विनती है
बनाओ अपने घर चाहे जितने
यु उजाडो ना खोंसले उनके
कही किसी दिन दुनिया ना कहे
एक गौरिया कभी मेरी खिड़की पर आती थी

लफंगा सा एक परिंदा

मैं लफंगा सा एक परिंदा
भरने लगा हु उड़ाने ऐसी
छोटा लगने लगा आसमा
और खोजना पड़ा नया जहा

जी रहा हर ख्वाब ऐसे
कि ज़िन्दगी लगने लगी छोटी
हर लम्हे में ख़ुशी इतनी
कि वक़्त की रफ़्तार भी धीमी

दोस्ती दुश्मनी की किसको पड़ी
अब खुदसे होगई मोहब्बत इतनी
मेरा हवाओ से जुड़ गया रिश्ता
उड़ता रहा मैं लफंगा सा एक परिंदा

Tuesday, July 27, 2010

भूतकाल का बंदी

कौन छुड़ाएगा ये बंधन है ऐसा
खुद की ज़ंजीरो में बंधा है बैठा
कच्चे धागों को समझा है लोहा
भूतकाल का बंदी मैं तो रह गया अकेला

मेरे मन के अंदर रात का साया
बाहर जो देखू है मेरी ही छाया
छुपा के खुदको खुद ही को खोजा
भूतकाल का बंदी मैं तो रह गया अकेला

मेरे कंधो पे मेरी यादो का है बोझा
कल ही के फेरे में चक्कर है सारा
देखा ना पाउ आज अपना ऐसा हु मारा
भूतकाल का बंदी मैं तो रह गया अकेला

Monday, July 26, 2010

इमोशनल अत्याचार

आखों के आँसुं है उसके हथियार
कोई तो बचाओ कबसे करे पुकार
सुबह नाश्ते में पराठा जला हुआ
लंच बॉक्स में वही टुकड़ा बचा हुआ
हमेशा फैले रहे किचन में आंतकवाद
मेरे क्रिकेट का होजाये सत्यानाश
जाने कौन कौन से जनम की बात
बस हर पल मुझको दिलाये याद
सोते हुए भी सारी रामायण सुनाये
रामायण में महाभारत भी छिड़ जाये
प्यार जैसे फोटो एल्बम में दब गया
शिकायतों का पुलिंदा ही बच गया
सात जनम का वादा अब कौन निभाए
होगा अहसान जो यह जनम बच जाये
ओ मेरे भगवन अब तो लेलो अवतार
सहन नहीं होता इमोशनल अत्याचार

Sunday, July 11, 2010

तेरी दीवानी

बाट मैं जोहू तोरी सैय्याँ
कहे सब होगई मैं बावरी
सब ऋतू आये जाये यहाँ
मेरे अखियन में बस पानी

प्रेम के रोग ने ऐसा जकड़ा
वैद्य खुद और खुद ही रोगी
खोयी रहु मैं ध्यान में तेरे
दुनिया समझे मैं रहु जागी

प्रीत का नाता तुझसे जोड़ा
और तु बना गया मेरा बैरी
सखिया मेरी छेड़े नाम से तेरे
और तु भुला मैं तेरी दीवानी

Saturday, July 10, 2010

नीम का पेड़

बीज नहीं सपना था बोया
तब दरख्त तुझसा पाया
तपते सूरज की अग्नि में
मेरे घर में कोमल छाया

देखा मैंने उगते हर एक पत्ता
जैसे बढता है बच्चा अपना
आज मेरे झोपड़े के आँगन में
कितने परिंदों का आशियाना

है तेरी उम्र जाने कितनी
मेरी तो अब होने आयी
मेरे चिता को आग दे कोई
तु ही अपनी लकड़ी जलाना

उपजंगे पौधे तेरे बीजो से
परिंदों तुम उन्हें दूर लेजाना
रखना धरा को हरा भरा
तु ही मेरा वंश चलाना

Saturday, July 03, 2010

last words

yes I know you have gone far away
and never gonna think about coming back
yes I know you don't want to talk
and never gonna look into my eyes.


it was never a love in my heart for you
if you can believe its more than that
and u must know even if you forget me
I will be waiting with your favorite roses


after this moment you will have a new life
and I will be stuck here for the eternity
I wish I would not have been meet you
or now at least once I see you again

Friday, July 02, 2010

परवाना

जादु तुम्हे कोइ आता है
या खुद्से हुआ मैं दीवाना
आखों मे तेरी कोइ नशा है
या है मेरा कोइ भुलावा

क्या है अदा तेरी ऐसी
ऐसा भी ये इश्क है क्या
मरते रहे हम हरदम
और तुमको खबर भी ना

आता है तुमको छिपाना
या फिर कोई अरमा ही नहीं
करते रहे हम इंतज़ार
और वो तेरा रास्ता ही नहीं

अब जो भी किस्मत मेरी
तुम ही हो ख्वाहिश मेरी
होगा कामयाब ये फसाना
या जल जाएगा ये परवाना

लोरी

तकिये की नीचे रखी नींद सुरीली
सोयेगा जो खायेगा मीठी जलेबी
पापा को ना आये बिटिया कोई लोरी
झूटे मूठे बहानो की यह है कहानी

तेरी नींद होगी सपनो से सजी
होगा तेरा राजा और तेरी रानी
हाथी शेर चीते करेंगे सलामी
परियो से होगी तेरी दोस्ती

झूले का ये देश कल होगा छोटा
ऊँची होगी उड़ाने कौन रोकेगा
दुनिया जीतने से पहले करले आराम
सो जा अब लेके करवट कोई आसान