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Sunday, May 03, 2015

मैं लिखता नहीं हूँ

सोचने वाला मन 
अब उलझनों में उलझा रहता है 
सुनने वाला मन
शोर से दूर शांत कोना खोजता हैं
लिखने वाला मन 
रोजमर्रा की जिंदगी में खोया रहता हैं
कभी ख्वाब लिखे थे
अब सच को जीते हैं 
न जाने क्या हुआ हैं 
मैं लिखता नहीं हूँ 
और लिखने को कुछ सूझता नहीं हैं 

 
कुछ यादें हैं
अब वो साफ़ नहीं धुधली सी हैं 
कुछ बाते हैं
अब वो भी बेमानी लगती हैं 
सब कुछ बिखरा हैं 
बेतरतीब रखी जैसे किताबे हैं 
न जाने क्या हुआ हैं 
मैं लिखता नहीं हूँ 
और लिखने को कुछ सूझता नहीं हैं 

 
कलम रुकी हैं
या फिर मेरा कागज उड़ा हैं 
शब्द रूठे हैं 
या फिर कोई अहसास गुम हुआ हैं 
न जाने क्या हुआ हैं
मैं लिखता नहीं हूँ 
और लिखने को कुछ सूझता नहीं हैं 

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