About Me

I write poems - I m going towards me, I write stories - किस्से ओमी भैय्या के, I write randomly - squander with me

Friday, January 27, 2012

रात का दर्द


रात के अँधेरे को  
निराशाओं का मायने न बना दिया होता 
हमेशा तुमने बस 
इसके बीत जाने का इंतज़ार न किया होता 
रौशनी के लिए 
बस आने वाले दिन का आसरा ना लिया होता 
जो तुम कुछ और सुन पाते 
तो समझ जाते एक अकेली रात का दर्द 

दूर कहीं बैठे 
सितारों से लिपटी फिर भी दूर ही रहती 
चाँद भी इसका 
कभी आधा कभी पूरा तो कभी अमावस्या 
रतजगो में फंसे 
रात के मुसाफिरों ने भी इसको कोसा 
जो तुम कही ठहर जाते 
तो समझ जाते एक अकेली रात का दर्द 

भूख

भजन सुनाते आते जाते
करते हैं बड़ी बड़ी बाते 
कहते मैं हूँ भविष्य देश का 
और मैं ही हूँ वरदान शिव का 
कभी धरा का इन्सान महान
तो कभी सितारों सा दीप्तमान 
जितने लोग उतनी ही बाते 
सारी यूँ ही बेकार की बाते
कोई नहीं बताता कैसे कमाऊ रोटी
आखिर भूख भी तो कोई चीज़ है होती 

Thursday, January 26, 2012

बूढी माँ

इस बार जब वो शहर से
छुट्टियों में वापस गाँव आया
रसोई में बर्तनों को बिखरा पाया
डब्बो के ढक्कन खुले पड़े थे
माँ की साफ़ रहने वाली रसोई में
तेल के कुछ दाग बिखरे पड़े थे
आधे काले आधे सफ़ेद बालो से ढके
चेहरे पे कुछ झुर्रिया भी थी
काम करते करते थक कर
माँ अक्सर बैठ भी जाती थी
लेकिन सुनकर उसकी फरमाईश
आँखों में चमक पहले सी थी
निकल पड़ी अपना वही पुराना
झोला लेकर सामान खरीदने
इतने दिनों बाद आया है बेटा
उसके लिए गाज़र का हलवा बनाने
लेकिन जब गाजर के हलवे में 
नमक पड़ गया
और स्वाद से वो
नमकीन हो गया 
तब भी रखा उसने याद
हलवे में स्नेह की मिठास
समझ गया वो
अब वक़्त आ गया है
कि अब वो भी बड़ा हो जाये 
माँ की ऊँगली छोड़
अब उसका हाथ थाम ले 
माँ की नज़र अब कमज़ोर हो रही है 
क्यूंकि माँ अब बूढी हो रही है

जिनके खयालो से


एक ख्याल की जगह हो गयी खाली 
जो बात हुई आज पुराने दोस्तों से 
अब पता चला उठ गयी उनकी डोली
अरमान थे रोशन मेरे जिनके खयालो से

हमने सुना दुल्हन के लिबाज़ में 
उस दिन खूब लग रही थी वो 
मेहमानों के भीड़ में जाने 
पहचाने चेहरे खोज रही थी वो 
जब देखा मेरे दोस्त को 
पलकों से ये बात बतायी उसने 
नदी जो तैर आयी आखों में 
उसमे दो बुँदे भी है मेरे लिए   
अब जाना वो भी रोये थे याद करके हमे 
अरमान थे रोशन मेरे जिनके खयालो से

इतने भी दिन तो नहीं हुए 
अपना शहर हमे छोड़े हुए 
जैसे कल ही उसके घर पर 
गए थे कोई बहाना करके
मजाक में उसने कही थी शादी की बात
हमे लगा था हमे रोकने के है तरीके 
काश कुछ और पल उनसे चुराए होते  
अरमान थे रोशन मेरे जिनके खयालो से


(हमारे एक मित्र को समर्पित  )

Saturday, November 19, 2011

इश्क होने लगा है


अरमानो के सुने मकान में 
हर पल निगाहों के सामने 
दिल की तेज धडकनों में 
अब कोई रहने लगा है 
शायद ये खुमार है या फ़िर 
इश्क होने लगा है 

इत्तेफाक से कोई मिल जाये 
हर बार ऐसा होता तो नहीं 
ऐसे ही इत्तेफाक पे यकीन
ना जाने क्यूँ होने लगा है 
ये यकीन भी इत्तेफाक है या फ़िर
इश्क होने लगा है 

Tuesday, November 15, 2011

रंगरेज़ पिया

ओ रंगरेज़ पिया मुझे रंग दे 
तु अपने ही इश्क के रंग में

मंदिर मस्जिद मैं क्या जाऊ
बिकते वहाँ है कपड़े रंग बिरंगे 
बाज़ार बना कर रखा है सबने 
तेरा रंग आखिर कौन बताये
ओ रंगरेज़ पिया मुझे रंग दे 
तु अपने ही इश्क के रंग में

चमड़ी रंग दी गोरी काली
रख दिया कोरा मन मेरा 
इसको कितने रंग चढ़ाये 
फिर भी रहा ना कोई गहरा  
ओ रंगरेज़ पिया मुझे रंग दे 
तु अपने ही इश्क के रंग में

Sunday, July 31, 2011

तुम

एक अधुरी कविता हो तुम
मेरी कालजयी रचना हो तुम
एक अनसुलझा विचार हो तुम
कुछ लिख लेने की वजह हो तुम
होठो में छाई ख़ामोशी हो तुम
आँखों में तैरती ख्वाहिश हो तुम
कुछ पा लेने का हौसला हो तुम
कुछ खो देने का सुकुन हो तुम

जितना करीब आता हूँ
उतनी ही दुर हो तुम
जितना तुम्हे जानता हूँ
उतनी ही नयी सी हो तुम
कोई रिश्ता सा लगता है
फ़िर भी अंजान हो तुम
सोचता हूँ अक्सर यही कि
ज़िन्दगी ऐसी क्यों हो तुम?

Monday, July 11, 2011

मेरी कविताये यु न पढ़ा करो

तुम शब्द मेरे यु न सुना करो
हृदय की वेदना यु न जाना करो
कुछ सूखे कुछ गिले कागज है
तुम इनको यु न छुआ करो
कितनी बार कहा है तुमसे
मेरी कविताये यु न पढ़ा करो

रातकली तुम स्वप्न में मिली
स्वप्न की बाते न किया करो
भोर की किरणों से न बच पाया
उस सपने के बारे में न पूछा करो
कितनी बार कहा है तुमसे
मेरी कविताये यु न पढ़ा करो

न कोई छंद न कोई अलंकार
सजावट की यु न आशा करो
जो याद आये वो लिख पाए
सभी बातो की यु न बाते करो
कितनी बार कहा है तुमसे
मेरी कविताये यु न पढ़ा करो

Wednesday, June 29, 2011

ट्रेफिक जाम

गाड़ियों के पीछे है गाड़ियों का रेला
गाड़ियों के आगे खड़ा सिपाही अकेला
लाल बत्ती को सब कोसे है भैया
कार की सीट पे सिमट गयी दुनिया

होर्न पर शक्ति प्रदर्शन है करते
भूल गए सब्र से इंतेज़ार करना
थोड़ी सी जगह से चाहे निकलना
सब चाहे यही तो कैसे होगा जाना

कहने को पढ़े लिखे है डॉक्टर
कोई है इंजिनियर कोई है मैनेजर
समस्या में देखो इनका योगदान
अपनी तो कार हम है बड़े इन्सान

कुछ का काम अमीरों को कोसना
अपनी स्कूटर या ऑटो खुसेड़ना
छोटे से अहंकार के सब है मारे
नियमो को पालना सिद्धांतो के परे

अपने दो मिनट की जल्दी में
दुसरो के लुटवाए दिए घंटे
गलती मान के सुधर जाये
ऐसे तो नहीं कोई नेक बंदे

कह गए सिया से देखो राम
कलजुग माने ट्रेफिक जाम
कैसे सतयुग फिर से आएगा
बेचारा किसी सिग्नल पे फँस जायेगा

तेरा ख्याल

जब भी आया तेरा ख्याल
जैसे किसी ने लगा दिया गुलाल
और रंग बिखर गए चेहरे पर
जैसे होली का हो त्यौहार

फिर याद आये दोस्तों से झगड़े
तेरे लिए कॉलेज से भी भागे
न जाने कितना लेते रहे उधार
बस करके वादा कल दे देंगे यार

छोड़ा आये अपना शहर
तोड़ के रिश्ता वो पुराना
मेरे ऑफिस में नहीं कोई
टूटी फूटी टपरी का कोना
अक्सर याद आते है हाय
वो एक समोसा और एक चाय

Saturday, June 25, 2011

लोकतंत्र का नारा

ये कैसा है लोकतंत्र का नारा
आम आदमी है नेताओ का मारा

कोई थोपा जाता हाई कमान से
कोई बन जाता प्रधानमंत्री जन्म से
जिसको कहना है वो चुप बैठ रहता
जिसको समझ नही वो काव काव है करता
किसी को अपनी बेटी की चिंता
देश की बेटिया चाहे मरती रहे
कोई लगवाता अपनी मूर्ति यहाँ वहाँ
चाहे देश की मूर्ति खंडित होते रहे
केंद्र का करते है ये विरोध
सकारात्मक विपक्ष की भूमिका
राज्यों में सरकार इनकी
लेकिन फिर भी वही पिटारा
ये कैसा है लोकतंत्र का नारा
आम आदमी है नेताओ का मारा

पत्रकार एजेंट बने है और
उद्योगपति काटे जंगल
जंगल वाले चलाये गोली
हर परिवार का बेटा घायल
अपना देश अपना न रहा
गर्व था जिन शहरो पर
उन शहरो में गाव का आदमी
अब बाहरी बन है गया
वोटो ने बिगाड़ा है खेल सारा
ये कैसा है लोकतंत्र का नारा
आम आदमी है नेताओ का मारा

Tuesday, April 26, 2011

मेरे पाँव

गीली ठण्ड को महसुस करते है
पानी को छुना पाँव भूले नहीं
उंगलियों में रेत छुपा के लाते है
लहरों से चोरी करना भूले नहीं
सम्हलने की कोशिश करते है
चट्टानों पे खड़ा होना भूले नहीं
कंकडो से साफ़ जगह देख लेते है
पत्थरो की पहचान भूले नहीं
भागने की होड़ में चल नहीं पाते
कदमो के निशान छोड़ना भूले नहीं
भूले नहीं थे कुछ भी मेरे पाँव
बस इन जूतों में बंधे रहते थे

Photo courtesy of Hari

Saturday, March 12, 2011

सड़के

मेरे गाँव की दो सड़के
कहने को तो दोनों हमारी
लेकिन एक कच्ची एक पक्की
पहले दोनों कच्ची थी
दुःख दर्द की साथी थी
एक के गड्ढो पर दूसरी भी रोती थी
दोनों अभागी सी जीती थी
कच्ची से हुआ ये व्यव्हार सौतेला
क्युकि पक्की से दौरा मंत्री का था निकला

एक दिन किसी को गाँव के याद आयी
उसने मंत्री से आने की गुहार लगायी
था उसने सोचा गाँव के हालत दिखा कर
उनको सवाल पूछेगा विकास के नाम पर
मंत्री के आने से पहले
चमचो ने सड़क बनवाई
पैसे लिए दोनों के लेकिन
किस्मत एक ही की चमकाई
कर दिया कुछ इंतज़ाम ऐसा
गाँव लगने लगा शहर जैसा
जिस रास्ते आया था
उसी रास्ते लौटा काफीला
मंत्री को भा गया विकास ऐसा
जिसने शिकायत की थी उसे फटकारा
बोले इस गाँव को मॉडल बनायेंगे
और इसी तरह देश को प्रगति की राह पर चलाएंगे

अब पक्की को हो गया
गुमान नए रूप पर अपने
किसी अमीर महिला के तरह
वो देती कच्ची को ताने
भाग कर्म के देनी लगी प्रवचन
तो कभी कच्ची के चरित्र पर लांछन
कच्ची से और ना सुना गया
उसने भी अपना आप खो दिया
इतना ना इतराओ पक्की से बोली
दुःख दर्द के साथी से ठीक नहीं ऐसी ठिठोली
ये जो रूप में निखार आया है
बस ऊपर से पावडर ही लगाया है
अंदर से तुम भी कमजोर मेरी जितनी
धो कर जायेगा तुम्हे बारिश का पहला पानी
फ़िर अपने रूप के साथ ना जी पायोगी
समझती हु तुम्हे फ़िर कभी ना हंस पाओगी

वो शाम

राह तो तुमने देर तक देखी होगी
मुझसे लड़ने की जरुर ठानी होगी
लेकिन मेरे ना आ पाने के फ़िर भी
कुछ बहाने कुछ वजहे सोची होगी
खत्म ना हुआ होगा तेरा इंतेज़ार
वो शाम जो अब तक है उधार

किसी फूल की खुशबू ने तुमको
फ़िर से यादो में ठकेला होगा
एक ही सवाल के जवाब ने तुमको
फ़िर से कई सवालो में घेरा होगा
उसने बनाया होगा फ़िर से लाचार
वो शाम जो अब तक है उधार

उन राहों पर जो फ़िर से चल पाता
सही गलत की जो जिरह कर पाता
लम्हों का हिसाब जो मैं रख पाता
अपना हर क़र्ज़ जो अदा कर पाता
तो दे जाता तुम्हे ये अनुपम उपहार
वो शाम जो अब तक है उधार

Tuesday, March 01, 2011

शादी की बात

एक दिन सुबह माता ने फ़ोन घुमाया
और लड़की देखने का फरमान सुनाया
हम तो अभी उठे है नहाने का प्लान बनाया है
और उसके बाद हमे अभी ऑफिस भी जाना है
जो उनको समझाया तो बोली वहा भी चले जाना
उससे मिलो पहले जिससे तुम्हे है मिलवाना
जमाना अब नया है मिलने का तरीका भी नया
घर में चाय नहीं किसी कॉफ़ी शॉप में ही बुला लिया
मेनू को देखकर वो उसमे जो थेसिस करने लगी
हमने उन्हें याद दिलाया ये पहली मुलाक़ात है अपनी
अभी तुम पचास रुपये ही क्वालीफाई कर पाई हो
जो महंगा है खाना तो खर्च करो जो अपने पैसे लाई हो
हर मुलाक़ात के बाद तुम्हारा बजेट बढ़ाएंगे
MBA किया है कभी तो दिमाग लगायेंगे

खाने का नाम सुनकर वो बोली
अभी बना लेती हु चाय और मैग्गी
कुछ दिन उसपर काम चलाना होगा
कभी मेरी तो कभी तुम्हारी माँ को गेस्ट बनाना होगा
होता काम बहुत है शुक्रवार तक
मूवी हम शनिवार को ही जायेंगे
तुम्हारे कार्ड में थोड़ी सी शापिंग
और वीकेंड खाना बाहर ही खायेंगे

गृहस्थ जीवन का ऐसा सुन्दर सपना
हम दोनो ने जो मिल जुल के देखा
एक कॉफ़ी में ही बात जम गयी
और पिज्जा खाने की रकम बच गयी
आमंत्रण के नाम पर
फेसबुक में एक इवेंट बना दिया
और शादी की जगह
फेसबुक का स्टेटस बदल दिया
अब हम जीवन जन्मान्तर के साथी है
पांच दिन ऑफिस के और दो दिन अपने खातिर है

रेत का फूल

यहाँ रेत का समुन्दर है
लहरों में हवा का शोर है
सूरज उगलता है आग
कोई ना रहा अब मेरे साथ

कभी थी कलियों यहाँ खेलती
फूलो से सजी थी ये नगरी
आती गयी सबकी बारी
अब यहाँ मैं अकेला पहरी
खुशबु का लगता था मेला
रंगों का था जादू फैला

था रंगों पे गुमान सबको
मौसम की लगी नज़र हमको
ऐसा मौत का मंजर देखने
रेत में अब हु मैं अकेला
सिख लिया रेत में जीना
पानी की हर बूँद को पीना
हर साथी को सूखते देखा
रंगों को दफ़न होते देखा

लड़ता रहा मौसमो के साथ
हर बूँद कुछ और देर बचाता रहा
जिस्म में बची है अब थोड़ी सी जान
खड़ा हु लेके बाकियों का अरमान
बारिश के आने की है आस
फैला के जाऊंगा बीज जो है मेरे पास

वो कचरा बीनता है

टूटी बोतलों के ढक्कन में
फटे कपड़ो के साबुत जेबों में
छोटे मोटे लोहे के टुकडो में
वो ज़िन्दगी तलाशता है
वो कचरा बीनता है

कुछ आकार बना लेता है
जंग लगे तारो से
बेकार चीजों के ठेर में भी
वो खिलौना तलाशता है
वो कचरा बीनता है

लोगो की गालियों को कर
अनसुना अपने में खोया रहता है
दिखने में कम उमर का शायद
वो अपनी उमर तलाशता है
वो कचरा बीनता है

फेके गए टूटे हुए सामानों में
कुछ साबुत टुकड़े खोज ही लेता है
लोगो के इस्तेमाल हुई खुशियों में
अपनी भी ख़ुशी तलाशता है
वो कचरा बीनता है

Monday, January 31, 2011

भीगी सी याद

आज सुबह घर के बाहर
कुछ ओस के बुँदे है
शायद रात में कोई
भीगी सी याद गुजरी होगी
दीवारों से सट कर
हथेलियों को जोड़ कर
इधर उधर पानी फेकती
भीगी सी याद गुजरी होगी

हम भी भीगा करते थे
कागज़ की नाव के साथ
छोटी छोटी लहरों के संग
सब दौड़ लगाये करते थे
रेशमी दुप्पटे के आड़ में कभी
कभी किसी के इंतज़ार में
मिटटी पर पैरो के निशान बनाते
पैदल चलते भीगा करते थे
उन्ही जाने अनजाने मोड़ो की
भीगी सी याद गुजरी होगी

गर्माहट है मुठ्ठियों की
हवा में थोड़ी ठंडक है
सच के सूखे मौसम में
गीली ये ओस की बुँदे है
किसी का तोहफा देने को
भीगी सी याद गुजरी होगी

Saturday, January 29, 2011

ख़ामोशी

खामोश है हवा
बंद खिडकियों के दरम्या
खामोश है दीवारे
उनमे टंगी तस्वीरो की तरह
अजीब सी ख़ामोशी
आजकल रहती है मेरे घर में
ख़ामोशी के शोर में
खुद से हो नहीं पाती बाते

इस कोने से
घर के उस कोने तक
जाने कितनी
मीलो की है दुरिया
जब गया था
पिछली बार मैं वहा
सुना था उस
कोने का भी फलसफा

अपनी शक्ल भी
आईने में अजनबी लगती है
अब जिंदगी भी
बिता हुआ कल लगती है
खोल लु दरवाज़ा
अब मेरी हिम्मत नहीं होती
अजीब सी ख़ामोशी
अब मेरे लबो से नहीं जाती


Wednesday, January 05, 2011

गुमनाम शाम

कभी किसी गुमनाम शाम की बाहों में
युहीं याद आ जाता है वो पुराना वादा
फ़िर बीते हुए लम्हों की तस्वीर लिए
वो ताकता रहता है खाली आसमा

आखों के रंग बदलती थी जो बाते
आज अपने साथ ले आती है बुँदे
युहीं पलकों में तैरती रहती है
अब उनको जमीन पे नहीं गिराता

किसी के आने की उम्मीद नहीं रखता
ना किसी इत्तेफाक पर यकीन करता
युहीं इस तरह वक़्त है बीत जाता
फ़िर भी वो उस जगह से नहीं उठता

Tuesday, January 04, 2011

कवि की व्यथा

एक मृगनयनी
कवि महाराज से बोली
ये आप क्या करते हो
इधर उधर की बाते कहते हो
कभी बाते गंभीर होती है
अक्सर बिना सर पैर की होती है
क्यों नहीं कुछ अच्छा लिखते
कुछ प्रेम व्रेम की बाते करते
जो कभी किया नहीं प्यार
तुमे लगे नहीं लिख पाओगे श्रृगांर
तो एक कम करो आसान
चलाओ कोई हास्य का बाण

कवि ने सोचा
लिखे कोई प्रेम कविता
करे युवती के रूप का बखान
फिर आया उसके दबंग भाइयो का ध्या
वैसे भी नारी वर्णन में कितने कवि बर्बाद हुए
परेशान थे अब कैसे अपनी नैया पार लगे

बालिके को इम्प्रेस करने कि जो थी ठानी
उन्होंने हास्य की पुरी हिस्ट्री छान मारी
किसी असहाय का मजाक उड़ाना
होगा हास्य निम्न कोटि का
लेकिन औकात भी कहा थी
कि लिखे कुछ उच्च कोटि का
राजनीति से प्रेरित व्यंग्य के दिन लद गए
क्युंकि आम लोग उनसे ज्यादा कमीने हो गये
आजकल हँसी के माने बदल गए
टीवी के कुछ शो हँसाने को रह गए

लिख दी बाते दो चार
कुछ आचार कुछ विचार
खुद समझ नहीं पाये क्या लिखा है
हास्य के नाम पर क्या गंध छोड़ा है
विनाशकाले विपरीत बुद्धि से बच गए
और सही समय पर अपने इरादों से हट गए

किसी को बताया नहीं
कि कभी कुछ ऐसा भी था लिखा
मृगनयनी से बोले
लिखेंगे आपके लिए ये वादा रहा



Monday, November 29, 2010

कभी मिल गए तो

अगर कभी करनी पड़ जाये बात
तो सोचता हु पहले कौन बोलेगा
क्या होगी कोई नयी सी बात
या वही पुराना किस्सा होगा
 
पुरानी आदतों की शिकायत होगी
या अंजानो की तरह परिचय होगा
क्या पुछेंगे हम दुर रहने का सबब 
या फिर पास आने का इरादा होगा  
 
होगी लबो पे बेवजह मुस्कान 
या आखों में खालीपन होगा
तेरे चेहरे में कोई शिकन होगी
या सुर्ख गालो का रंग लाल होगा
 
शायद जिंदगी होगी तेरी बेहतर
और शिकवा बस हमे होगा
अगर कभी करनी पड़ जाये बात
तो सोचता हु पहले कौन बोलेगा

Monday, October 25, 2010

दीवाने

भीड़ भरे बाजारों से
जो गलिया गुजरती है
आवाजों के झुरमुट में 
पहचानी कोई हंसी नहीं 

हर एक लम्हे में 
एक उम्र गुजरती है
और इंतज़ार में उनके
शाम ढलती ही नहीं

कुछ देर में बादलो की भी 
बस तस्वीर बदलती है 
रंग बदलते आसमा में 
एक रंग है जो आता नहीं 

यु सूरज को डुबाने से
अँधेरा तो हो जाता नहीं
रौशनी चाँद की बहुत है  
चिलमन है कि हटते नहीं

एक दीदार की तमन्ना में
रात युही गुजरती है
फिर भी सकरी गलियों में 
इन दीवानों की कमी नहीं

Wednesday, October 13, 2010

माटी

हल सुनाऊ दिन भर का 
बैठे थे सब साथ में साथी 
खेल रचे थे भाति भाति 
साँझ भई तो माटी के पुतले 
मिल गए फिरसे माटी में

सब लगते थे जैसे सच्चे
प्रेम के थे जो संबंध बांधे 
निभाई दुश्मनी भी कुछ से 
साँझ भई तो घर को लौटे 
रह गए रिश्ते माटी में

कुछ जोड़ा और कुछ घटाया
घर भी बनाये सपनो के
अपने नाम से नारे लगाये
मिटा दिए नाम किसी के 
साँझ भई तो कोई ना रहे
खो गए नाम माटी में

Monday, October 11, 2010

अग्निपथ

शंखनाद का अनुनाद है
चुनौतीयो के संवाद है
ना शस्त्र है ना अस्त्र है
ये ऐसा एक कुरुक्षेत्र है
जहाँ हर प्रहार सख्त है
ये जीवन एक अग्निपथ है

झुलसी हुई पलके है
नयनो को छुती लपटे है
अश्रु की धारा अनवरत है
फिर भी बढते वो स्वपन है
आहुति में गिरता ये रक्त है
ये जीवन एक अग्निपथ है

भाग्य बस एक खेल हो
कर्मो का ऐसा मेल हो
सबसे महान वो मनुष्य है
जिसने पाया अपना उद्देश्य है
आगे बढते रहना ही गत है
ये जीवन एक अग्निपथ है

Saturday, October 09, 2010

गौरिया

टेबल पर बिखरी किताबो से
जब मन उब जाता था
मेरे खिड़की पर कोई
एक संगीत युही सुनाता था

फुदक कर नन्हे कदमो से
वो जैसे दुरिया नापती थी
या नृत्य की कोई नयी विधा
जो मुझको सिखाना चाहती थी

कभी सूखे तिनके
अपनी चोंच में ले आती थी
जैसे अपने बन रहे
घर की बाते मुझे बताती थी
एक गौरिया कभी मेरी खिड़की पर आती थी

अब खिड़की के सामने
एक ईमारत ऊँची है
खोजा उसे बहुत पर
वो बस यादो में बची है

एक मित्र ने बताया
उसके घर अब भी आती है
मुझसे जैसे रूठ गयी पर
कुछ लोगो से अभी भी दोस्ती है

मेरी बस यही विनती है
बनाओ अपने घर चाहे जितने
यु उजाडो ना खोंसले उनके
कही किसी दिन दुनिया ना कहे
एक गौरिया कभी मेरी खिड़की पर आती थी

लफंगा सा एक परिंदा

मैं लफंगा सा एक परिंदा
भरने लगा हु उड़ाने ऐसी
छोटा लगने लगा आसमा
और खोजना पड़ा नया जहा

जी रहा हर ख्वाब ऐसे
कि ज़िन्दगी लगने लगी छोटी
हर लम्हे में ख़ुशी इतनी
कि वक़्त की रफ़्तार भी धीमी

दोस्ती दुश्मनी की किसको पड़ी
अब खुदसे होगई मोहब्बत इतनी
मेरा हवाओ से जुड़ गया रिश्ता
उड़ता रहा मैं लफंगा सा एक परिंदा

Tuesday, July 27, 2010

भूतकाल का बंदी

कौन छुड़ाएगा ये बंधन है ऐसा
खुद की ज़ंजीरो में बंधा है बैठा
कच्चे धागों को समझा है लोहा
भूतकाल का बंदी मैं तो रह गया अकेला

मेरे मन के अंदर रात का साया
बाहर जो देखू है मेरी ही छाया
छुपा के खुदको खुद ही को खोजा
भूतकाल का बंदी मैं तो रह गया अकेला

मेरे कंधो पे मेरी यादो का है बोझा
कल ही के फेरे में चक्कर है सारा
देखा ना पाउ आज अपना ऐसा हु मारा
भूतकाल का बंदी मैं तो रह गया अकेला

Monday, July 26, 2010

इमोशनल अत्याचार

आखों के आँसुं है उसके हथियार
कोई तो बचाओ कबसे करे पुकार
सुबह नाश्ते में पराठा जला हुआ
लंच बॉक्स में वही टुकड़ा बचा हुआ
हमेशा फैले रहे किचन में आंतकवाद
मेरे क्रिकेट का होजाये सत्यानाश
जाने कौन कौन से जनम की बात
बस हर पल मुझको दिलाये याद
सोते हुए भी सारी रामायण सुनाये
रामायण में महाभारत भी छिड़ जाये
प्यार जैसे फोटो एल्बम में दब गया
शिकायतों का पुलिंदा ही बच गया
सात जनम का वादा अब कौन निभाए
होगा अहसान जो यह जनम बच जाये
ओ मेरे भगवन अब तो लेलो अवतार
सहन नहीं होता इमोशनल अत्याचार

Sunday, July 11, 2010

तेरी दीवानी

बाट मैं जोहू तोरी सैय्याँ
कहे सब होगई मैं बावरी
सब ऋतू आये जाये यहाँ
मेरे अखियन में बस पानी

प्रेम के रोग ने ऐसा जकड़ा
वैद्य खुद और खुद ही रोगी
खोयी रहु मैं ध्यान में तेरे
दुनिया समझे मैं रहु जागी

प्रीत का नाता तुझसे जोड़ा
और तु बना गया मेरा बैरी
सखिया मेरी छेड़े नाम से तेरे
और तु भुला मैं तेरी दीवानी

Saturday, July 10, 2010

नीम का पेड़

बीज नहीं सपना था बोया
तब दरख्त तुझसा पाया
तपते सूरज की अग्नि में
मेरे घर में कोमल छाया

देखा मैंने उगते हर एक पत्ता
जैसे बढता है बच्चा अपना
आज मेरे झोपड़े के आँगन में
कितने परिंदों का आशियाना

है तेरी उम्र जाने कितनी
मेरी तो अब होने आयी
मेरे चिता को आग दे कोई
तु ही अपनी लकड़ी जलाना

उपजंगे पौधे तेरे बीजो से
परिंदों तुम उन्हें दूर लेजाना
रखना धरा को हरा भरा
तु ही मेरा वंश चलाना

Saturday, July 03, 2010

last words

yes I know you have gone far away
and never gonna think about coming back
yes I know you don't want to talk
and never gonna look into my eyes.


it was never a love in my heart for you
if you can believe its more than that
and u must know even if you forget me
I will be waiting with your favorite roses


after this moment you will have a new life
and I will be stuck here for the eternity
I wish I would not have been meet you
or now at least once I see you again

Friday, July 02, 2010

परवाना

जादु तुम्हे कोइ आता है
या खुद्से हुआ मैं दीवाना
आखों मे तेरी कोइ नशा है
या है मेरा कोइ भुलावा

क्या है अदा तेरी ऐसी
ऐसा भी ये इश्क है क्या
मरते रहे हम हरदम
और तुमको खबर भी ना

आता है तुमको छिपाना
या फिर कोई अरमा ही नहीं
करते रहे हम इंतज़ार
और वो तेरा रास्ता ही नहीं

अब जो भी किस्मत मेरी
तुम ही हो ख्वाहिश मेरी
होगा कामयाब ये फसाना
या जल जाएगा ये परवाना

लोरी

तकिये की नीचे रखी नींद सुरीली
सोयेगा जो खायेगा मीठी जलेबी
पापा को ना आये बिटिया कोई लोरी
झूटे मूठे बहानो की यह है कहानी

तेरी नींद होगी सपनो से सजी
होगा तेरा राजा और तेरी रानी
हाथी शेर चीते करेंगे सलामी
परियो से होगी तेरी दोस्ती

झूले का ये देश कल होगा छोटा
ऊँची होगी उड़ाने कौन रोकेगा
दुनिया जीतने से पहले करले आराम
सो जा अब लेके करवट कोई आसान

आरज़ू

है मौसिकी तेरी तो तेरा ही नगमा दे,
तेरे संग गाउ मैं खुदा ऐसी बंदिशे दे

मेरा जिस्म तो एक बुत है
मेरी रूह को तू सुकुन दे
है अगर सांसें तेरी तो इनको सबब दे
तुझसे मिले सकु ऐसी मुझे राहे दे

क्या करू मैं तेरी इबादत
या बन जाऊ खुद ही खुदा
है आशिकी मेरी तो इसे एक महबूब दे
देखू खुदमे तुझको ऐसी मोह्हब्बत दे

Tuesday, April 27, 2010

प्रेम कविता

कैसे कह दू क्या है होता
कैसे लिख दू प्रेम कविता

माधुर्य का पर्याय तुम्ही हो
संध्या की हो अद्भुत बेला
कुमुदनी कुसुम कहू या
कह दू चन्द्रमा की शीतलता

नैनों में लिखी एक पहेली
भावनावो की हो रंगोली
अनंत की हो जैसे रौशनी
हो मेरे ह्रदय की सहेली

तू अलबेली जो सुनना चाहे
शब्द नहीं जो वो कह पाए
कैसे कह दू क्या है होता
कैसे लिख दू प्रेम कविता

Monday, April 05, 2010

रिश्ते

अनलिखे ख़त के है कभी कागज़ कोरे
कभी किताब में दबे से भूले ये बिसरे
रिश्ते आखिर है ये कैसे सिलसिले
हम न समझे फिर भी निभाते रहे

एक थी मंजिले और एक थे रस्ते
आज है वो हमसफ़र क्यों अनजाने
सांसो को भी छु लेने कि कभी नजदिकिया
और कभी नाम भी न ले पाने कि दुरिया
कभी सुरमई शाम की है ठंडी हवा
है कभी तपते सूरज की गर्मिया
रिश्ते आखिर है कैसी ऋतुये
बिना वक़्त के यह बदल जाये

आँचल के पीछे से है झाकते
छोटे होने की जिद में है लड़ते
कभी यु ही मुह फुलाये बैठे रहे
और कभी आके खुदसे गुदगुदाए
जिनके बिना कभी जीना था मुश्किल
कही दूर ही छुट जाये हो जाये ओझिल
रिश्ते आखिर है ये कैसे है बूँदें
बारिश हो फिर भी रह जाये सूखे

Thursday, November 19, 2009

नया शहर

क्यों सुबह चलती नहीं कोई पुरवाई
क्यों सर्द होती नहीं यहाँ की शामे
क्यों कोई नहीं डरता तपती धुप से
क्यों कोई नहीं देखता रास्ता बारिश का
आये जो बिना बुलाये बौछारे
क्यों कोई यहाँ नहीं भीगता

क्यों बचपन यहाँ है इतना सोचता
क्यों कोई बच्चा पतंग नहीं लुटता
क्यों नहीं होती शादी गुडिया गुड्डो की
क्यों कोई रूठने के बाद खुद ही नहीं मानता
उम्र से जो सब लगते है सब छोटे यहाँ
क्यों बातो से वो बच्चा नहीं लगता

कोई नहीं जोड़ता पड्सियो से रिश्ता
कोई नहीं अब चीनी मागने आता
क्यों कोई नहीं है यहाँ दादी-दादा
क्यों हर दरवाजा बंद है रहता
इतनी भाषाए सबको आती है मगर
क्यों कोई बेवजह बाते नहीं करता

किनारा

कोई यु ही सूरज डूबा रहा था
था कोई खोया किसी की बाहों में
कोई फिर से बचपन जी रहा था
था कोई किसी के इंतज़ार में
मैं भी वजह खोज रहा था
अपने वहा इस तरह होने की .......

कभी तोलते थे रेत मुठियों में
था लिखा नाम कभी रेत में
जो भी लिखा था कभी प्यार से
वो अब लहरों में कही बह गया
मैं वही रेत खोज रहा था
फेकी थी जो तुने मुझपे

कभी थे कहते सपने कल के
कभी थे बहाने देर से आने के
चुप कही बैठे रहते कभी तो
शोर कभी सुनते लहरों के
मैं वही अलफ़ाज़ सुन रहा था
जो कभी खामोश थे

अब कोई सूरज डूबा चूका था
कर रहा था कोई वादा मिलने का
मैं भी वजह खोज रहा था
अपने वहा से अब जाने की ....

Saturday, November 14, 2009

एक सपना

पलकों की पीछे वाली गलियों मे
आँख मीचे एक सपना रहता है
बड़े बड़े सपनो के इस शहर मे
वो बच्चो सा सहमा रहता है


मेरे खोये बचपन की निशानी वो
मेरे वापस आने की राह तकता है
बंद कर घर के दरवाजो को
खिड़कियों से झाका करता है


झूटे मूटे वादों को सच्चा मान के
बाकी सपनो से लड़ा करता है
मेरे आने पे शिकायात करेगा
बाकी सपनो यह धमकी देता है


बचपन के साथियों को भूल गया हु
मेरे बड़े होने कि कीमत यही है
इसका भी पता किसी कागज़ मे लिख के
उस कागज़ का पता भूल गया हु

मेरे भी दिल कि किसी कोने मे
मुठी बंधे एक उम्मीद रहती है
हर बड़े सपने के पुरे होने के बाद
इसके पुरे होने कि दुआ मांगती है

Thursday, September 11, 2008

ख्वाहिश


बंद हो पलके तेरी फिर भी बंद आखों मे नेह हो
दुर हो मुझसे तू कही फिर भी पहुचने कि राह हो
है खवाहिश है कि दिल को ख्वाहिश करने कि इजाजत हो
ना हो साथ तेरा ज़िन्दगी फिर भी जीने कि मुझे आदत हो


ना हो कोई हक़ तुझपे फिर भी जिद करने का हक़ हो
सच हो तेरा कठोर फिर भी भ्रम मेरा खुबसूरत हो
है सवाल यही कि दिल को सवाल करने कि इजाजत हो
तु कुछ न कहे जिंदगी फिर भी खामोशी जवाब हो

हो तेरे लाख बहाने फिर भी वजह मेरी वाजिब हो
हो तेरे हमसफ़र और भी लेकिन रस्ते मेरे जानिब हो
है इन्तजार यही कि इन्तजार करने कि इजाजत हो
तु न आए ज़िन्दगी फिर भी मेरे रुकने कि वजह हो

Wednesday, July 16, 2008

काश

कोई खवाब देखे तू ऐसा
जो मुझ बिन लगे अधुरा
कोई मांगे तू ऐसी दुआ
जिसमे हो नाम मेरा
ये काश की तुझे भी मोह्हबत होजाए
चलने लगे तेज तेरी सांसें
दिल भी बेचैनी मे धड़के
कही मन तेरा न लागे
युही बेवजह तू मुसुकुराए
ये काश की तुझे भी मोह्हबत होजाए
रातो को गिने तारे
चाँद अपना सा तुझे लागे
आईने से करे बाते
भीड़ भी रहे अकेले
ये काश की तुझे भी मोह्हबत होजाए
जुबा कुछ न कह पाये
निगाहे कहदे सारी बाते
हम समझे तेरे इशारे
फिर भी बनाये बहाने
ये काश की तुझे भी मोह्हबत होजाए

Monday, June 30, 2008

क्या कह रहा हु मैं

उड़ जाने दे तू हवाओ के संग
नापू गगन मैं बन के पतंग
दिल ही तो तेरा हु खो जाने दे
मुझको किसी का हो जाने दे
सुन भी ले क्या कह रहा हु मैं

कौन जाने है पानी कितना गहरा
यु ना तू डर लगाने दे गोता
मिले भी न जो मोती तो क्या है
डूबने का भी है अपना मज़ा
सुन भी ले क्या कह रहा हु मैं

बारिश का देखना चाहे तू नज़ारा
रेगिस्तान मे फिरे क्यों मारा मारा
मौसमो का ना कर इंतज़ार
कर भरोसा मैं लाऊंगा बहार
सुन भी ले क्या कह रहा हु मैं

Sunday, November 18, 2007

future song

खवाब मेरे जाने क्यों धुआँ बनके उड़ गए
जिन आंखों से सजाया था उन्ही से देखते रहे

तिनका तिनका था जोडा आशियाने क लिए
आंधी ने यह न सोचा एक पल क लिए
बिखर गए सब जैसे कोई रिश्ता न हो
रह गई सुनी डाल मुझपे तरस खाने को

दर्द से दिल चीख भी नही पाया
और मेरे कातिल मुझपे हँसते रहे

Wednesday, October 31, 2007

naqab

पहने रहा यह नकाब कुछ ऐसे
अब पास मेरे सिवा इसके कुछ नही
था शयद मेरा भी कोई निशान कही
मुझे अब अपनी ही शकल याद नही

नज़र जैसे सबकी मेरे नकाब पर है
अपने नाक़बो से उन्हें नफरत ऐसी है
किस कलाकार ने बनाया है इसे पूछते है
कहता ह ज़माने ने दिया है तो हस्ते है
जब आया था यहा तो मांस का टुकडा था
आज ज़माने ने इन्सान बना दिया है मुझे
सिखाई मुझे सब लोगो ने उनकी ही जुबान
आज कहते है मेरे अल्फास नए से क्यों है
साजिश है मेरे नकाब को छीनने की यह
उनके नकाब अब शिशो से साफ जो है

कहता है ज़माना एक बात बता दे
तू चीज़ क्या है हमे समझा दे
कहता था पहले तू क्यों हमसा नही है
बना इसके तरह तो अब यह वैसा नही है
अगर हर शकल यहा नकाबपोश है
तो मेरे नकाब से ही यह सवाल क्यों है

Sunday, October 21, 2007

duriya

मालुम न था यह बात इतनी बिगड़ जायेगी
दो पल कि यह दुरी इतनी बड़ी हो जायेगी

रोका नही था यह सोच कर
ख़ुद ही लौट आयोगे
मेरे नही तो कम से कम
अपने दिल की ही मान लोगे
मालुम न था दिल की बात बेअसर हो जायेगी
दो पल कि यह दुरी इतनी बड़ी हो जायेगी

हम जो देना चाहे आवाज़
तो तुम हो जाने कहा
परछाइंया भी न आए नज़र
अँधेरा यह छाया कैसा
मालुम न था प्यार कि रौशनी मद्धम हो जायेगी
दो पल कि यह दुरी इतनी बड़ी हो जायेगी

Saturday, October 20, 2007

sharabi

अगर शराब है खत्म तेरे मैखाने मे
तो नज़रे मिला के पानी ही देदे जाम मे
किसको चड़ता है नशा यहा पीने से
हमको तो नशा है तेरे इश्क मे जीने से

है बहूत बड़ा यह शहर
इसमे मैखाने और भी है
नए नही इस शहर मे जो
बाकियों से हम अनजाने है
बहाना है पीना जो आते है तेरे मैखाने मे
तरसे हुए है सुकून पाते है तेरे दीदार मे

जानते है तुझे हमसे कोई वास्ता नही
मैं तेरे लिए एक शराबी ही सही
खाली यह जाम हँसता है मुझपे
इसकी चुभती हसी को एक हद देदे
ज़िंदगी नही तो मौत का ही जाम दे
पानी भी नही तेरे पास तो साकी जहर देदे
बहूत है गलिया शहर मे लड़खडांने क लिए
आज लड़खडाने से पहले सम्हाल ले तेरे मैखाने मे

Saturday, June 30, 2007

Zinda

रौशनी और अंधेरो का फर्क महसूस नही होता
सन्नाटे मे अकेला मेरा दिल ही है चिखता
सांसें चलती है जैसे कोई क़र्ज़ चुकाने को
जलता है मेरा बदन मुझको यह बताने को
की मैं जिंदा हू

एक वही लम्हा जी रहा ह मैं बरसों से
खुलती है मेरी आँखें इन्ही दीवारों मे
मरने क लिए मैं क्या नही करता
नाकामयाब कोशिश यह कहती है
की मैं जिंदा हू

कोई तो जनता होगा आख़िर यह कैसी कैद है
मेरे इंतज़ार की क्यों नही कोई हद है
खुदा तुझपे ही अब रह गया भरोसा
तू ही बता यह तेरी राजा है या कोई गलती
की मैं जिंदा हू

Wednesday, May 23, 2007

meri zindagi

मेरी ज़िंदगी मुझे दूर ले आई
मेरा न कोई माजी रहा
हर कोशिश होती गई कामयाब
मेरा न कोई रास्ता रहा

मंजिले मिलती रही हरदम मुझे
खवाब होते रहे उम्मीदों से बड़े
ज़िंदगी मुड्गायी जिस तरफ़ देखा
मेरा न कोई मंजर रहा

यार सब कही खो से गए
प्यार किताब मे दब से गए
मशरुफ़ रहा कागजों मे इतना
मेरा न कोई अहसास रहा

दिल चाहे रोना तो कोना कहा है
जिसपे रखे सिर वह कन्धा कहा है
मिलता रहा इतनो चेहरों से रोज़
मुझे कोई चेहरा याद न रहा

मेरी ज़िंदगी मुझे दूर ले आई
मेरा न कोई माजी रहा
हर कोशिश होती गई कामयाब
मेरा न कोई रास्ता रहा

Sunday, March 25, 2007

moksha

मैं ही ब्रम्हा विष्णु हू मैं हू शिवा
मेरे ही कंठो मे समाया हलाहल सारा

विस्मित करती सबको जो यह है धरा
गगन का बैठाया जाल उसपे सारा
ललचाने को तुझे मैं सितारे चमकता
चाँद और सूरज को देता मैं ही उजाला

रंग सरे मैंने रंगे फूलों को महकाया
वायु को बहने के लिए दिशा ज्ञान समझाया
नदियों को मोडा है ऐसे की जंगलो को सींचा
गहरी खाई ऊँचे पहाडो का मैं ही रचियिता

मनुष्य का मन है मेरा ही आविष्कार
मोहमाया मे देखता है तू सारा संसार
खोल नयन देख कौन खड़ा है उसके पार
तू है मेरा ही अंश मैं तेरा साकार

मैं ही ब्रम्हा विष्णु ह मैं ह शिवा
सारा जग मुझे है और मैं तुझमे समाया

ranbhoomi

देखो यह रणभूमि है

हर यहा मृत्यु शैया
जीत रात भर का आशीर्वाद है
सुबह लाती ललकार शत्रु की
साँझ सूचना घायलों की
मरने वालो कि पहचान कहा है
साबुत मिले वह शव कहा है
यहा लहू कि कहा कमी है
देखो यह रणभूमि है

गर्जन करते आगे बड़ते है
अपनी वीरता का दंभ भरते है
देखे महावीर जो कल लड़ते थे
आज खुले नयनो से सोये है
महत्वाकांक्षा के बलि हुए वह
बचे हुए फिर भी चलते है
जितने की ही सबको पड़ी है
देखो यह रणभूमि है

कुछ के पास अनुभव बहुत है
कुछ सीधे आँगन से आए है
मानव के सारे समंध भूल के
अपनी आंखों मे लहू लाये है
टपके पसीना शरीर से बाद मे
पहले इनका लहू बहता है
तलवार यहा अब किसकी सुखी है
देखो यह रणभूमि है

Tuesday, February 13, 2007

when i was old

ढलती रही मेरी उमर धुप की तरह
आई नज़र ज़िंदगी एक दिन शाम की तरह

जब देखा पीछे तो घर नही था
कोई रास्ता कोई नुक्कड़ नही था
बस हाथ उठाया जो किसी के तरफ़
लौट आया ख़ुद ही कटी पतंग की तरह

मेरे बचपन मेरे जवानी की
जैसे कोई अधूरी कहानी सी
कितने बाते याद आने लगी
सब यू ही आखें गीली करनी लगी
छुने की कोशिश जो की एक अहसास को
उड़ गया वह किसी खुशबू की तरह

आज मेरी तरह यहा और भी है
सबके कल थे अलग आज एकसे है
हर किसी ने कुछ पाया था कभी
आज सब है खाली मुठी की तरह

ढलती रही मेरी उमर धुप की तरह
आई नज़र ज़िंदगी एक दिन शाम की तरह

Friday, February 02, 2007

you n me

you are the son of the king
and you may think
this world is so great
everyone is here friend
they offer u sweets
when you comes on streets

I m the son of a farmer
for me this world is harder
when I wander in roads
they call me ghost
when I look into there shops
they show me way to rocks

Wednesday, October 18, 2006

my gloomy sunday

सारी रात मैं सोया नही
खुली आंखों मे ही सवेरा हो गया
देखता रहा अपनी छत को
और दूसरा कुछ भी न सोच पाया
मॅन मे भी सपने देखने की हिम्मत नही थी
और दिमाग ने भी कोई दूसरी बात नही सोची
हर पल मैं दर्द सहता रहा
अपने जिस्म के अन्दर उस ज़हर का
कभी सिकुदन सी थी मेरी आंतो मे
कभी खून कही रुक रहा था
साँसें भी अन्दर ही गुम हो जाती
ज़ोर मुझे बाकी न था
सारी रात मैं सोया नही
खुली आंखों मे ही सवेरा हो गया


(It was the suicidal note of the protagaonist)

Saturday, August 12, 2006

the little bird

देखा इस गगन को कई बार रंग बदलते हुए
हर बार लगता है यह है बस छूने के लिए

बैठे है किसी दरख्त मे नज़र रखे दूर सितारों पे
पंख फैलाये एक दिन उड़ने को नया जहा खोजने के लिए

मगर लगता है डर बड़े शिकारियों से
जो बैठे है मुझे कैद करने के लिए

अब जो भी हो अपना जिस्म दाव पे लगा के
लिए हुए उम्मीद उड़ चले हम जानने के लिए

की खुदा ने क्या चुना है मेरे लिए
उसकी ज़मी सारी उमर या अपना आसमा उड़ने के लिए

Friday, April 14, 2006

khanabadosh

चल रहे है राहों मे
मंजिले अभी दूर है
देता है जो ज़माना हमको
वह कहा मंज़ूर है
है अपने खाव्बो का नशा
अब किसे यहा होश है
ज़िंदगी है एक कारवा
और हम खानाबदोश है

Friday, March 10, 2006

voice of failure

काढिंनाइँ चाहे जितनी आए
राहे मुजको मिल न पाए
फिर भी मैं चलूँगा,एक कदम मैं और रखूँगा

पैरो मे जितने चाहे चुभे काटे
हाथ मे हो जितनी भी गरम सलाखे
मैं इनं पहाडो को काटुंगा
सागर मे भी पुल बाधुन्गा
आँसुओ को भी बहना होगा
खुनं बनके पसीना बहेगा
जो धड़कता है इस जिस्म मी
उसके लिए मैं चलूँगा, एक कदम मैं और रखूँगा

सोचता हू मैं जो रुक गया यहा
आगे न फिर बन पायेगा कोई रास्ता
जो आते है मेरे बाद वह जायेगे कहा
आखिर किसी को तो है यहा दफ़न होना
दफ़न होने के लिए मैं चलूँगा,एक कदम मैं और रखूँगा

माना आज मैं नाकामयाब हू
कल भी मेरा शायद न निशान होगा
जब कोई गुजरेगा इन रास्तों से
वही मेरा इनाम होगा
उस इनाम के लिए मैं चलूँगा,एक कदम मैं और रखूँगा

Wednesday, March 01, 2006

i m not smoker

बस एक कश और कशमकश सारी खत्म हो जाती है
थकी हुई मेरी आंखो मे फिर ज़िंदगी नज़र आती है
यह धुआं जाने क्या असर करता मेरी रूह पे
दिल और दिमाग पे ताजगी सी छा जाती है

आसमा पे कितनी लकीरे खीची है इस धुएं ने
मुझे तो तस्वीर बस उसकी नज़र आती है
तुझसे किया था वादा अब हाथ न लगायेंगे कभी
अब तेरी यादों मे ही हर शाम यह जलती है

जब शाम को यह दो उंगलियों पे नाचती है
यारो की महफ़िल कितनी जवा हो जाती है
आज के लिए खुशी का आलम लाती है
कल के लिए कितनी यादें बनती है

आया जो कोई अचानक बगल से
फेका इसे फिर हमने चुपके से
यह बात हमारे बडो को बताती है
की आज भी हममे तहजीब बाकी है

Sunday, February 12, 2006

1 yr after GATE

it was last yr when i was in xam centre fighting with gate paper ,trying to solve them n they are one of the most stubborn things in life .
when i go back, those horror books and nasty question are seems to ask me "kyu bhai kaise ho, kya chal raha hai, humse to nipat liye ab kya karoge" and i give just a smile like an innocent guy .
well about GAte i can write a very little poem (which hardly seems like that)

mare the tukke
ban gaye lukhhe
pahunche iit me
barish ho gayi
mumbai bah gayi
aur dekhe aage