About Me

I write poems - I m going towards me, I write stories - किस्से ओमी भैय्या के, I write randomly - squander with me

Wednesday, July 16, 2008

काश

कोई खवाब देखे तू ऐसा
जो मुझ बिन लगे अधुरा
कोई मांगे तू ऐसी दुआ
जिसमे हो नाम मेरा
ये काश की तुझे भी मोह्हबत होजाए
चलने लगे तेज तेरी सांसें
दिल भी बेचैनी मे धड़के
कही मन तेरा न लागे
युही बेवजह तू मुसुकुराए
ये काश की तुझे भी मोह्हबत होजाए
रातो को गिने तारे
चाँद अपना सा तुझे लागे
आईने से करे बाते
भीड़ भी रहे अकेले
ये काश की तुझे भी मोह्हबत होजाए
जुबा कुछ न कह पाये
निगाहे कहदे सारी बाते
हम समझे तेरे इशारे
फिर भी बनाये बहाने
ये काश की तुझे भी मोह्हबत होजाए

Monday, June 30, 2008

क्या कह रहा हु मैं

उड़ जाने दे तू हवाओ के संग
नापू गगन मैं बन के पतंग
दिल ही तो तेरा हु खो जाने दे
मुझको किसी का हो जाने दे
सुन भी ले क्या कह रहा हु मैं

कौन जाने है पानी कितना गहरा
यु ना तू डर लगाने दे गोता
मिले भी न जो मोती तो क्या है
डूबने का भी है अपना मज़ा
सुन भी ले क्या कह रहा हु मैं

बारिश का देखना चाहे तू नज़ारा
रेगिस्तान मे फिरे क्यों मारा मारा
मौसमो का ना कर इंतज़ार
कर भरोसा मैं लाऊंगा बहार
सुन भी ले क्या कह रहा हु मैं

Sunday, November 18, 2007

future song

खवाब मेरे जाने क्यों धुआँ बनके उड़ गए
जिन आंखों से सजाया था उन्ही से देखते रहे

तिनका तिनका था जोडा आशियाने क लिए
आंधी ने यह न सोचा एक पल क लिए
बिखर गए सब जैसे कोई रिश्ता न हो
रह गई सुनी डाल मुझपे तरस खाने को

दर्द से दिल चीख भी नही पाया
और मेरे कातिल मुझपे हँसते रहे

Wednesday, October 31, 2007

naqab

पहने रहा यह नकाब कुछ ऐसे
अब पास मेरे सिवा इसके कुछ नही
था शयद मेरा भी कोई निशान कही
मुझे अब अपनी ही शकल याद नही

नज़र जैसे सबकी मेरे नकाब पर है
अपने नाक़बो से उन्हें नफरत ऐसी है
किस कलाकार ने बनाया है इसे पूछते है
कहता ह ज़माने ने दिया है तो हस्ते है
जब आया था यहा तो मांस का टुकडा था
आज ज़माने ने इन्सान बना दिया है मुझे
सिखाई मुझे सब लोगो ने उनकी ही जुबान
आज कहते है मेरे अल्फास नए से क्यों है
साजिश है मेरे नकाब को छीनने की यह
उनके नकाब अब शिशो से साफ जो है

कहता है ज़माना एक बात बता दे
तू चीज़ क्या है हमे समझा दे
कहता था पहले तू क्यों हमसा नही है
बना इसके तरह तो अब यह वैसा नही है
अगर हर शकल यहा नकाबपोश है
तो मेरे नकाब से ही यह सवाल क्यों है

Sunday, October 21, 2007

duriya

मालुम न था यह बात इतनी बिगड़ जायेगी
दो पल कि यह दुरी इतनी बड़ी हो जायेगी

रोका नही था यह सोच कर
ख़ुद ही लौट आयोगे
मेरे नही तो कम से कम
अपने दिल की ही मान लोगे
मालुम न था दिल की बात बेअसर हो जायेगी
दो पल कि यह दुरी इतनी बड़ी हो जायेगी

हम जो देना चाहे आवाज़
तो तुम हो जाने कहा
परछाइंया भी न आए नज़र
अँधेरा यह छाया कैसा
मालुम न था प्यार कि रौशनी मद्धम हो जायेगी
दो पल कि यह दुरी इतनी बड़ी हो जायेगी

Saturday, October 20, 2007

sharabi

अगर शराब है खत्म तेरे मैखाने मे
तो नज़रे मिला के पानी ही देदे जाम मे
किसको चड़ता है नशा यहा पीने से
हमको तो नशा है तेरे इश्क मे जीने से

है बहूत बड़ा यह शहर
इसमे मैखाने और भी है
नए नही इस शहर मे जो
बाकियों से हम अनजाने है
बहाना है पीना जो आते है तेरे मैखाने मे
तरसे हुए है सुकून पाते है तेरे दीदार मे

जानते है तुझे हमसे कोई वास्ता नही
मैं तेरे लिए एक शराबी ही सही
खाली यह जाम हँसता है मुझपे
इसकी चुभती हसी को एक हद देदे
ज़िंदगी नही तो मौत का ही जाम दे
पानी भी नही तेरे पास तो साकी जहर देदे
बहूत है गलिया शहर मे लड़खडांने क लिए
आज लड़खडाने से पहले सम्हाल ले तेरे मैखाने मे

Saturday, June 30, 2007

Zinda

रौशनी और अंधेरो का फर्क महसूस नही होता
सन्नाटे मे अकेला मेरा दिल ही है चिखता
सांसें चलती है जैसे कोई क़र्ज़ चुकाने को
जलता है मेरा बदन मुझको यह बताने को
की मैं जिंदा हू

एक वही लम्हा जी रहा ह मैं बरसों से
खुलती है मेरी आँखें इन्ही दीवारों मे
मरने क लिए मैं क्या नही करता
नाकामयाब कोशिश यह कहती है
की मैं जिंदा हू

कोई तो जनता होगा आख़िर यह कैसी कैद है
मेरे इंतज़ार की क्यों नही कोई हद है
खुदा तुझपे ही अब रह गया भरोसा
तू ही बता यह तेरी राजा है या कोई गलती
की मैं जिंदा हू

Wednesday, May 23, 2007

meri zindagi

मेरी ज़िंदगी मुझे दूर ले आई
मेरा न कोई माजी रहा
हर कोशिश होती गई कामयाब
मेरा न कोई रास्ता रहा

मंजिले मिलती रही हरदम मुझे
खवाब होते रहे उम्मीदों से बड़े
ज़िंदगी मुड्गायी जिस तरफ़ देखा
मेरा न कोई मंजर रहा

यार सब कही खो से गए
प्यार किताब मे दब से गए
मशरुफ़ रहा कागजों मे इतना
मेरा न कोई अहसास रहा

दिल चाहे रोना तो कोना कहा है
जिसपे रखे सिर वह कन्धा कहा है
मिलता रहा इतनो चेहरों से रोज़
मुझे कोई चेहरा याद न रहा

मेरी ज़िंदगी मुझे दूर ले आई
मेरा न कोई माजी रहा
हर कोशिश होती गई कामयाब
मेरा न कोई रास्ता रहा

Sunday, March 25, 2007

moksha

मैं ही ब्रम्हा विष्णु हू मैं हू शिवा
मेरे ही कंठो मे समाया हलाहल सारा

विस्मित करती सबको जो यह है धरा
गगन का बैठाया जाल उसपे सारा
ललचाने को तुझे मैं सितारे चमकता
चाँद और सूरज को देता मैं ही उजाला

रंग सरे मैंने रंगे फूलों को महकाया
वायु को बहने के लिए दिशा ज्ञान समझाया
नदियों को मोडा है ऐसे की जंगलो को सींचा
गहरी खाई ऊँचे पहाडो का मैं ही रचियिता

मनुष्य का मन है मेरा ही आविष्कार
मोहमाया मे देखता है तू सारा संसार
खोल नयन देख कौन खड़ा है उसके पार
तू है मेरा ही अंश मैं तेरा साकार

मैं ही ब्रम्हा विष्णु ह मैं ह शिवा
सारा जग मुझे है और मैं तुझमे समाया

ranbhoomi

देखो यह रणभूमि है

हर यहा मृत्यु शैया
जीत रात भर का आशीर्वाद है
सुबह लाती ललकार शत्रु की
साँझ सूचना घायलों की
मरने वालो कि पहचान कहा है
साबुत मिले वह शव कहा है
यहा लहू कि कहा कमी है
देखो यह रणभूमि है

गर्जन करते आगे बड़ते है
अपनी वीरता का दंभ भरते है
देखे महावीर जो कल लड़ते थे
आज खुले नयनो से सोये है
महत्वाकांक्षा के बलि हुए वह
बचे हुए फिर भी चलते है
जितने की ही सबको पड़ी है
देखो यह रणभूमि है

कुछ के पास अनुभव बहुत है
कुछ सीधे आँगन से आए है
मानव के सारे समंध भूल के
अपनी आंखों मे लहू लाये है
टपके पसीना शरीर से बाद मे
पहले इनका लहू बहता है
तलवार यहा अब किसकी सुखी है
देखो यह रणभूमि है

Tuesday, February 13, 2007

when i was old

ढलती रही मेरी उमर धुप की तरह
आई नज़र ज़िंदगी एक दिन शाम की तरह

जब देखा पीछे तो घर नही था
कोई रास्ता कोई नुक्कड़ नही था
बस हाथ उठाया जो किसी के तरफ़
लौट आया ख़ुद ही कटी पतंग की तरह

मेरे बचपन मेरे जवानी की
जैसे कोई अधूरी कहानी सी
कितने बाते याद आने लगी
सब यू ही आखें गीली करनी लगी
छुने की कोशिश जो की एक अहसास को
उड़ गया वह किसी खुशबू की तरह

आज मेरी तरह यहा और भी है
सबके कल थे अलग आज एकसे है
हर किसी ने कुछ पाया था कभी
आज सब है खाली मुठी की तरह

ढलती रही मेरी उमर धुप की तरह
आई नज़र ज़िंदगी एक दिन शाम की तरह

Friday, February 02, 2007

you n me

you are the son of the king
and you may think
this world is so great
everyone is here friend
they offer u sweets
when you comes on streets

I m the son of a farmer
for me this world is harder
when I wander in roads
they call me ghost
when I look into there shops
they show me way to rocks

Wednesday, October 18, 2006

my gloomy sunday

सारी रात मैं सोया नही
खुली आंखों मे ही सवेरा हो गया
देखता रहा अपनी छत को
और दूसरा कुछ भी न सोच पाया
मॅन मे भी सपने देखने की हिम्मत नही थी
और दिमाग ने भी कोई दूसरी बात नही सोची
हर पल मैं दर्द सहता रहा
अपने जिस्म के अन्दर उस ज़हर का
कभी सिकुदन सी थी मेरी आंतो मे
कभी खून कही रुक रहा था
साँसें भी अन्दर ही गुम हो जाती
ज़ोर मुझे बाकी न था
सारी रात मैं सोया नही
खुली आंखों मे ही सवेरा हो गया


(It was the suicidal note of the protagaonist)

Saturday, August 12, 2006

the little bird

देखा इस गगन को कई बार रंग बदलते हुए
हर बार लगता है यह है बस छूने के लिए

बैठे है किसी दरख्त मे नज़र रखे दूर सितारों पे
पंख फैलाये एक दिन उड़ने को नया जहा खोजने के लिए

मगर लगता है डर बड़े शिकारियों से
जो बैठे है मुझे कैद करने के लिए

अब जो भी हो अपना जिस्म दाव पे लगा के
लिए हुए उम्मीद उड़ चले हम जानने के लिए

की खुदा ने क्या चुना है मेरे लिए
उसकी ज़मी सारी उमर या अपना आसमा उड़ने के लिए

Friday, April 14, 2006

khanabadosh

चल रहे है राहों मे
मंजिले अभी दूर है
देता है जो ज़माना हमको
वह कहा मंज़ूर है
है अपने खाव्बो का नशा
अब किसे यहा होश है
ज़िंदगी है एक कारवा
और हम खानाबदोश है

Friday, March 10, 2006

voice of failure

काढिंनाइँ चाहे जितनी आए
राहे मुजको मिल न पाए
फिर भी मैं चलूँगा,एक कदम मैं और रखूँगा

पैरो मे जितने चाहे चुभे काटे
हाथ मे हो जितनी भी गरम सलाखे
मैं इनं पहाडो को काटुंगा
सागर मे भी पुल बाधुन्गा
आँसुओ को भी बहना होगा
खुनं बनके पसीना बहेगा
जो धड़कता है इस जिस्म मी
उसके लिए मैं चलूँगा, एक कदम मैं और रखूँगा

सोचता हू मैं जो रुक गया यहा
आगे न फिर बन पायेगा कोई रास्ता
जो आते है मेरे बाद वह जायेगे कहा
आखिर किसी को तो है यहा दफ़न होना
दफ़न होने के लिए मैं चलूँगा,एक कदम मैं और रखूँगा

माना आज मैं नाकामयाब हू
कल भी मेरा शायद न निशान होगा
जब कोई गुजरेगा इन रास्तों से
वही मेरा इनाम होगा
उस इनाम के लिए मैं चलूँगा,एक कदम मैं और रखूँगा

Wednesday, March 01, 2006

i m not smoker

बस एक कश और कशमकश सारी खत्म हो जाती है
थकी हुई मेरी आंखो मे फिर ज़िंदगी नज़र आती है
यह धुआं जाने क्या असर करता मेरी रूह पे
दिल और दिमाग पे ताजगी सी छा जाती है

आसमा पे कितनी लकीरे खीची है इस धुएं ने
मुझे तो तस्वीर बस उसकी नज़र आती है
तुझसे किया था वादा अब हाथ न लगायेंगे कभी
अब तेरी यादों मे ही हर शाम यह जलती है

जब शाम को यह दो उंगलियों पे नाचती है
यारो की महफ़िल कितनी जवा हो जाती है
आज के लिए खुशी का आलम लाती है
कल के लिए कितनी यादें बनती है

आया जो कोई अचानक बगल से
फेका इसे फिर हमने चुपके से
यह बात हमारे बडो को बताती है
की आज भी हममे तहजीब बाकी है

Sunday, February 12, 2006

1 yr after GATE

it was last yr when i was in xam centre fighting with gate paper ,trying to solve them n they are one of the most stubborn things in life .
when i go back, those horror books and nasty question are seems to ask me "kyu bhai kaise ho, kya chal raha hai, humse to nipat liye ab kya karoge" and i give just a smile like an innocent guy .
well about GAte i can write a very little poem (which hardly seems like that)

mare the tukke
ban gaye lukhhe
pahunche iit me
barish ho gayi
mumbai bah gayi
aur dekhe aage